तो हम लोग ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रहकर कैसे बच सकते हैं? जिसकी चर्चा पहले–पहल प्रभु के द्वारा हुई, और सुननेवालों के द्वारा हमें इसका निश्चय हुआ।