P. O. C ബൈബിള്
पुराना नियम
भजन संहिता
अध्याय 78
- Verse 1: हे मेरे लोगो, मेरी शिक्षा सुनो; मेरे वचनों की ओर कान लगाओ!
- Verse 2: मैं अपना मुँह नीतिवचन कहने के लिये खोलूँगा; मैं प्राचीनकाल की गुप्त बातें कहूँगा,
- Verse 3: जिन बातों को हम ने सुना, और जान लिया, और हमारे बाप दादों ने हम से वर्णन किया है।
- Verse 4: उन्हें हम उनकी सन्तान से गुप्त न रखेंगे, परन्तु होनहार पीढ़ी के लोगों से, यहोवा का गुणानुवाद और उसकी सामर्थ्य और आश्चर्यकर्मों का वर्णन करेंगे।
- Verse 5: उसने तो याकूब में एक चितौनी ठहराई, और इस्राएल में एक व्यवस्था चलाई, जिसके विषय उसने हमारे पितरों को आज्ञा दी, कि तुम इन्हें अपने अपने बाल–बच्चों को बताना;
- Verse 6: कि आनेवाली पीढ़ी के लोग, अर्थात् जो बच्चे उत्पन्न होनेवाले हैं, वे इन्हें जानें; और अपने अपने बाल–बच्चों से इनका बखान करने में उद्यत हों,
- Verse 7: जिससे वे परमेश्वर का भरोसा रखें, और परमेश्वर के बड़े कामों को भूल न जाएँ, परन्तु उसकी आज्ञाओं का पालन करते रहें;
- Verse 8: और अपने पितरों के समान न हों, क्योंकि उस पीढ़ी के लोग तो हठीले और झगड़ालू थे, और उन्होंने अपना मन स्थिर न किया था, और न उनकी आत्मा परमेश्वर की ओर सच्ची रही।
- Verse 9: एप्रैमियों ने तो शस्त्रधारी और धनुर्धारी होने पर भी, युद्ध के समय पीठ दिखा दी।
- Verse 10: उन्होंने परमेश्वर की वाचा पूरी नहीं की, और उसकी व्यवस्था पर चलने से इन्कार किया।
- Verse 11: उन्होंने उसके बड़े कामों को और जो आश्चर्यकर्म उसने उनके सामने किए थे, उनको भुला दिया।
- Verse 12: उसने तो उनके बापदादों के सम्मुख मिस्र देश के सोअन के मैदान में अद्भुत कर्म किए थे।
- Verse 13: उसने समुद्र को दो भाग करके उन्हें पार करा दिया, और जल को ढेर के समान खड़ा कर दिया।
- Verse 14: उसने दिन को तो बादल के खम्भे से और रात भर अग्नि के प्रकाश के द्वारा उनकी अगुवाई की।
- Verse 15: वह जंगल में चट्टानें फाड़कर, उनको मानो गहिरे जलाशयों से मनमाना पिलाता था।
- Verse 16: उसने चट्टान से भी धाराएँ निकालीं और नदियों का सा जल बहाया।
- Verse 17: तौभी वे उसके विरुद्ध अधिक पाप करते गए, और निर्जल देश में परमप्रधान के विरुद्ध उठते रहे।
- Verse 18: अपनी चाह के अनुसार भोजन माँगकर मन ही मन परमेश्वर की परीक्षा की।
- Verse 19: वे परमेश्वर के विरुद्ध बोले, और कहने लगे, “क्या परमेश्वर जंगल में मेज लगा सकता है?
- Verse 20: उसने चट्टान पर मारके जल बहा तो दिया, और धाराएँ उमण्ड चलीं, परन्तु क्या वह रोटी भी दे सकता है? क्या वह अपनी प्रजा के लिए मांस भी तैयार कर सकता?”
- Verse 21: यहोवा सुनकर क्रोध से भर गया, तब याकूब के बीच आग लगी, और इस्राएल के विरुद्ध क्रोध भड़का;
- Verse 22: इसलिये कि उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास नहीं रखा था, न उसकी उद्धार करने की शक्ति पर भरोसा किया।
- Verse 23: तौभी उसने आकाश को आज्ञा दी, और स्वर्ग के द्वारों को खोला;
- Verse 24: और उनके लिये खाने को मन्ना बरसाया, और उन्हें स्वर्ग का अन्न दिया।
- Verse 25: मनुष्यों को स्वर्गदूतों की रोटी मिली; उसने उनको मनमाना भोजन दिया।
- Verse 26: उसने आकाश में पुरवाई को चलाया, और अपनी शक्ति से दक्खिनी बहाई;
- Verse 27: और उनके लिये मांस धूल के समान बहुत बरसाया, और समुद्र के बालू के समान अनगिनित पक्षी भेजे;
- Verse 28: और उनकी छावनी के बीच में, उनके निवासों के चारों ओर गिराए।
- Verse 29: वे खाकर अति तृप्त हुए, और उसने उनकी कामना पूरी की।
- Verse 30: उनकी कामना बनी ही रही, उनका भोजन उनके मुँह ही में था,
- Verse 31: कि परमेश्वर का क्रोध उन पर भड़का, और उसने उनके हृष्टपुष्टों को घात किया, और इस्राएल के जवानों को गिरा दिया।
- Verse 32: इतने पर भी वे और अधिक पाप करते गए; और परमेश्वर के आश्चर्यकर्मों की प्रतीति न की।
- Verse 33: तब उसने उनके दिनों को व्यर्थ श्रम में, और उनके वर्षों को घबराहट में कटवाया।
- Verse 34: जब वह उन्हें घात करने लगता, तब वे उसको पूछते थे; और फिरकर परमेश्वर को यत्न से खोजते थे।
- Verse 35: उनको स्मरण आता था कि परमेश्वर हमारी चट्टान है, और परमप्रधान परमेश्वर हमारा छुड़ानेवाला है।
- Verse 36: तौभी उन्होंने उसकी चापलूसी की; वे उस से झूठ बोले।
- Verse 37: क्योंकि उनका हृदय उसकी ओर दृढ़ न था; न वे उसकी वाचा के विषय सच्चे थे।
- Verse 38: परन्तु वह जो दयालु है, वह उनके अधर्म को ढाँपता, और उन्हें नष्ट नहीं करता; वह बारबार अपने क्रोध को ठण्डा करता है, और अपनी जलजलाहट को पूरी रीति से भड़कने नहीं देता।
- Verse 39: उसको स्मरण रहा कि ये नाशमान हैं, ये वायु के समान हैं जो चली जाती और लौट नहीं आती।
- Verse 40: उन्होंने कितनी ही बार जंगल में उससे बलवा किया, और निर्जल देश में उसको उदास किया!
- Verse 41: वे बारबार परमेश्वर की परीक्षा करते थे, और इस्राएल के पवित्र को खेदित करते थे।
- Verse 42: उन्होंने न तो उसका भुजबल स्मरण किया, न वह दिन जब उसने उनको द्रोही के वश से छुड़ाया था;
- Verse 43: कि उसने कैसे अपने चिह्न मिस्र में, और अपने चमत्कार सोअन के मैदान में किए थे।
- Verse 44: उसने तो मिस्रियों की नदियों को लहू बना डाला, और वे अपनी नदियों का जल पी न सके।
- Verse 45: उसने उनके बीच में डाँस भेजे जिन्होंने उन्हें काट खाया, और मेंढक भी भेजे जिन्होंने उनका बिगाड़ किया।
- Verse 46: उसने उनकी भूमि की उपज कीड़ों को, और उनकी खेतीबारी टिड्डियों को खिला दी थी।
- Verse 47: उसने उनकी दाखलताओं को ओलों से, और उनके गूलर के पेड़ों को बड़े बड़े पत्थर बरसाकर नष्ट किया।
- Verse 48: उसने उनके पशुओं को ओलों से, और उनके ढोरों को बिजलियों से मिटा दिया।
- Verse 49: उसने उनके ऊपर अपना प्रचण्ड क्रोध और रोष भड़काया, और उन्हें संकट में डाला, और दुखदाई दूतों का दल भेजा।
- Verse 50: उसने अपने क्रोध का मार्ग खोला, और उनके प्राणों को मृत्यु से न बचाया परन्तु उनको मरी के वश में कर दिया।
- Verse 51: उसने मिस्र के सब पहिलौठों को मारा, जो हाम के डेरों में पौरुष के पहले फल थे :
- Verse 52: परन्तु अपनी प्रजा को भेड़–बकरियों के समान प्रस्थान कराया, और जंगल में उनकी अगुवाई पशुओं के झुण्ड की सी की।
- Verse 53: तब वे उसके चलाने से बेखटके चले, और उनको कुछ भय न हुआ, परन्तु उनके शत्रु समुद्र में डूब गए।
- Verse 54: उसने उनको अपने पवित्र देश की सीमा तक, इसी पहाड़ी देश में पहुँचाया, जो उसने अपने दाहिने हाथ से प्राप्त किया था।
- Verse 55: उसने उनके सामने से अन्यजातियों को भगा दिया; और उनकी भूमि को डोरी से माप मापकर बाँट दिया; और इस्राएल के गोत्रों को उनके डेरों में बसाया।
- Verse 56: तौभी उन्होंने परमप्रधान परमेश्वर की परीक्षा की और उससे बलवा किया, और उसकी चितौनियों को न माना,
- Verse 57: और मुड़कर अपने पुरखाओं के समान विश्वासघात किया; उन्होंने निकम्मे धनुष के समान धोखा दिया।
- Verse 58: क्योंकि उन्होंने ऊँचे स्थान बनाकर उसको रिस दिलाई, और खुदी हुई मूर्तियों के द्वारा उसमें से जलन उपजाई।
- Verse 59: परमेश्वर सुनकर रोष से भर गया, और उसने इस्राएल को बिलकुल तज दिया।
- Verse 60: उसने शीलो के निवास, अर्थात् उस तम्बू को जो उसने मनुष्यों के बीच खड़ा किया था, त्याग दिया,
- Verse 61: और अपनी सामर्थ्य को बँधुआई में जाने दिया, और अपनी शोभा को द्रोही के वश में कर दिया।
- Verse 62: उसने अपनी प्रजा को तलवार से मरवा दिया, और अपने निज भाग के विरुद्ध रोष से भर गया।
- Verse 63: उनके जवान आग से भस्म हुए, और उनकी कुमारियों के विवाह के गीत न गाए गए।
- Verse 64: उनके याजक तलवार से मारे गए, और उनकी विधवाएँ रोने न पाईं।
- Verse 65: तब प्रभु मानो नींद से चौंक उठा, और ऐसे वीर के समान उठा जो दाखमधु पीकर ललकारता हो।
- Verse 66: उसने अपने द्रोहियों को मारकर पीछे हटा दिया; और उनकी सदा की नामधराई कराई।
- Verse 67: फिर उसने यूसुफ के तम्बू को तज दिया; और एप्रैम के गोत्र को न चुना;
- Verse 68: परन्तु यहूदा ही के गोत्र को, और अपने प्रिय सिय्योन पर्वत को चुन लिया।
- Verse 69: उसने अपने पवित्रस्थान को बहुत ऊँचा बना दिया, और पृथ्वी के समान स्थिर बनाया, जिसकी नींव उसने सदा के लिये डाली है।
- Verse 70: फिर उसने अपने दास दाऊद को चुनकर भेड़शालाओं में से ले लिया;
- Verse 71: वह उसको बच्चेवाली भेड़ों के पीछे पीछे फिरने से ले आया कि वह उसकी प्रजा याकूब की अर्थात् उसके निज भाग इस्राएल की चरवाही करे।
- Verse 72: तब उसने खरे मन से उनकी चरवाही की, और अपने हाथ की कुशलता से उनकी अगुवाई की।