ಕನ್ನಡ ಸತ್ಯವೇದವು
पुराना नियम
अय्यूब
अध्याय 26
2 : “निर्बल जन की तू ने कितनी बड़ी सहायता की, और जिसकी बाँह में सामर्थ्य नहीं, उसको तू ने कैसे सम्भाला है?
3 : निर्बुद्धि मनुष्य को तू ने कितनी अच्छी सम्मति दी, और अपनी खरी बुद्धि कैसी भली भाँति प्रगट की है?
4 : तू ने किसके हित के लिये बातें कहीं? और किसके मन की बातें तेरे मुँह से निकलीं?”
5 : “बहुत दिन के मरे हुए लोग भी जलनिधि और उसके निवासियों के तले तड़पते हैं।
6 : अधोलोक उसके सामने उघड़ा रहता है, और विनाश का स्थान ढक नहीं सकता।
7 : वह उत्तर दिशा को निराधार फैलाए रहता है, और बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखता है।
8 : वह जल को अपनी काली घटाओं में बाँध रखता, और बादल उसके बोझ से नहीं फटता।
9 : वह अपने सिंहासन के सामने बादल फैलाकर उसको छिपाए रखता है।
10 : उजियाले और अन्धियारे के बीच जहाँ सीमा बँधी है, वहाँ तक उसने जलनिधि की सीमा ठहरा रखी है।
11 : उसकी घुड़की से आकाश के खम्भे थरथराकर चकित होते हैं।
12 : वह अपने बल से समुद्र को शान्त करता, और अपनी बुद्धि से रहब को छेद देता है।
13 : उसकी श्वास से आकाशमण्डल स्वच्छ हो जाता है, वह अपने हाथ से वेग भागनेवाले नाग को मार देता है।
14 : देखो, ये तो उसकी गति के किनारे ही हैं; और उसकी आहट फुसफुसाहट ही सी तो सुन पड़ती है, फिर उसके पराक्रम के गरजने का भेद कौन समझ सकता है?”