पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
नीतिवचन
अध्याय 30
- Verse 1: याके के पुत्र आगूर के प्रभावशाली वचन। उस पुरुष ने ईतीएल और उक्काल से यह कहा :
- Verse 2: निश्चय मैं पशु सरीखा हूँ, वरन् मनुष्य कहलाने के योग्य भी नहीं; और मनुष्य की समझ मुझ में नहीं है।
- Verse 3: न मैं ने बुद्धि प्राप्त की है, और न परमपवित्र का ज्ञान मुझे मिला है।
- Verse 4: कौन स्वर्ग में चढ़कर फिर उतर आया? किसने वायु को अपनी मुट्ठी में बटोर रखा है? किसने महासागर को अपने वस्त्र में बाँध लिया है? किसने पृथ्वी की सीमाओं को ठहराया है? उसका नाम क्या है? और उसके पुत्र का नाम क्या है? यदि तू जानता हो तो बता!
- Verse 5: परमेश्वर का एक एक वचन ताया हुआ है, वह अपने शरणागतों की ढाल ठहरा है।
- Verse 6: उसके वचनों में कुछ मत बढ़ा, ऐसा न हो कि वह तुझे डाँटे और तू झूठा ठहरे।
- Verse 7: मैं ने तुझ से दो वर माँगे हैं, इसलिये मेरे मरने से पहले उन्हें मुझे देने से मुँह न मोड़,
- Verse 8: अर्थात् व्यर्थ और झूठी बात मुझ से दूर रख; मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना; प्रतिदिन की रोटी मुझे खिलाया कर।
- Verse 9: ऐसा न हो कि जब मेरा पेट भर जाए, तब मैं इन्कार करके कहूँ कि यहोवा कौन है? या अपना भाग खोकर चोरी करूँ, और अपने परमेश्वर का नाम अनुचित रीति से लूँ।
- Verse 10: किसी दास की, उसके स्वामी से चुगली न करना, ऐसा न हो कि वह तुझे शाप दे, और तू दोषी ठहराया जाए।
- Verse 11: ऐसे लोग हैं, जो अपने पिता को शाप देते और अपनी माता को धन्य नहीं कहते।
- Verse 12: ऐसे लोग हैं जो अपनी दृष्टि में शुद्ध हैं, तौभी उनका मैल धोया नहीं गया।
- Verse 13: एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं– उनकी दृष्टि क्या ही घमण्ड से भरी रहती है, और उनकी आँखें कैसी चढ़ी हुई रहती हैं।
- Verse 14: एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं, जिनके दाँत तलवार और उनकी दाढ़ें छुरियाँ हैं, जिनसे वे दीन लोगों को पृथ्वी पर से, और दरिद्रों को मनुष्यों में से मिटा डालें।
- Verse 15: जैसे जोंक की दो बेटियाँ होती हैं, जो कहती हैं, “दे दे,” वैसे ही तीन वस्तुएँ हैं, जो तृप्त नहीं होती; वरन् चार हैं, जो कभी नहीं कहतीं, “बस।”
- Verse 16: अधोलोक और बांझ की कोख, भूमि जो जल पी पीकर तृप्त नहीं होती, और आग जो कभी नहीं कहती, ‘बस’।
- Verse 17: जिस आँख से कोई अपने पिता पर अनादर की दृष्टि करे, और अपमान के साथ अपनी माता की आज्ञा न माने, उस आँख को तराई के कौवे खोद खोदकर निकालेंगे, और उकाब के बच्चे खा डालेंगे।
- Verse 18: तीन बातें मेरे लिये अधिक कठिन हैं, वरन् चार हैं, जो मेरी समझ से परे हैं :
- Verse 19: आकाश में उकाब पक्षी का मार्ग, चट्टान पर सर्प की चाल, समुद्र में जहाज़ की चाल, और कन्या के संग पुरुष की चाल।
- Verse 20: व्यभिचारिणी की चाल भी वैसी ही है; वह भोजन करके मुँह पोंछती, और कहती है, मैं ने कोई अनर्थ काम नहीं किया।
- Verse 21: तीन बातों के कारण पृथ्वी काँपती है; वरन् चार हैं, जो उससे सही नहीं जातीं;
- Verse 22: दास का राजा हो जाना, मूढ़ का पेट भरना,
- Verse 23: घिनौनी स्त्री का ब्याहा जाना, और दासी का अपनी स्वामिन की वारिस होना।
- Verse 24: पृथ्वी पर चार छोटे जन्तु हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान हैं :
- Verse 25: चींटियाँ निर्बल जाति तो हैं, परन्तु धूपकाल में अपनी भोजनवस्तु बटोरती हैं;
- Verse 26: बिज्जू बली जाति नहीं, तौभी उनकी मान्दें पहाड़ों पर होती हैं;
- Verse 27: टिड्डियों के राजा तो नहीं होता, तौभी वे सब की सब दल बाँध बाँधकर चलती हैं;
- Verse 28: और छिपकली हाथ से पकड़ी तो जाती है, तौभी राजभवनों में रहती है।
- Verse 29: तीन सुन्दर चालवाले प्राणी हैं; वरन् चार हैं, जिन की चाल सुन्दर है :
- Verse 30: सिंह जो सब पशुओं में पराक्रमी है, और किसी के डर से नहीं हटता;
- Verse 31: शिकारी कुत्ता और बकरा, और अपनी सेना समेत राजा।
- Verse 32: यदि तू ने अपनी बड़ाई करने की मूढ़ता की, या कोई बुरी युक्ति बाँधी हो, तो अपने मुँह पर हाथ रख।
- Verse 33: क्योंकि जैसे दूध के मथने से मक्खन, और नाक के मरोड़ने से लहू निकलता है, वैसे ही क्रोध के भड़काने से झगड़ा उत्पन्न होता है।