வேதாகமம்
पुराना नियम
अय्यूब
अध्याय 21
2 : “चित्त लगाकर मेरी बात सुनो; और तुम्हारी शान्ति यही ठहरे।
3 : मेरी कुछ तो सहो कि मैं भी बातें करूँ; और जब मैं बातें कर चुकूँ, तब ठट्ठा करना।
4 : क्या मैं किसी मनुष्य की दोहाई देता हूँ? फिर मैं अधीर क्यों न होऊँ?
5 : मेरी ओर देख कर चकित हो, और अपनी अपनी उंगली दाँतों तले दबाओ।
6 : जब मैं स्मरण करता तब मैं घबरा जाता हूँ, और मेरी देह थर–थर काँपने लगती है।
7 : क्या कारण है कि दुष्ट लोग जीवित रहते हैं, वरन् बूढ़े भी हो जाते, और उनका धन बढ़ता जाता है?
8 : उनकी सन्तान उनके संग, और उनके बाल–बच्चे उनकी आँखों के सामने बने रहते हैं।
9 : उनके घर में भयरहित कुशल रहता है, और परमेश्वर की छड़ी उन पर नहीं पड़ती।
10 : उनका साँड़ गाभिन करता और चूकता नहीं, उनकी गायें बियाती हैं और गर्भ कभी नहीं गिरातीं।
11 : वे अपने लड़कों को झुण्ड के झुण्ड बाहर जाने देते हैं, और उनके बच्चे नाचते हैं।
12 : वे डफ और वीणा बजाते हुए गाते, और बाँसुरी के शब्द से आनन्दित होते हैं।
13 : वे अपने दिन सुख से बिताते, और पल भर ही में अधोलोक में उतर जाते हैं।
14 : तौभी वे परमेश्वर से कहते, ‘हम से दूर हो! तेरी गति जानने की हम को इच्छा नहीं रहती।
15 : सर्वशक्तिमान क्या है कि हम उसकी सेवा करें? यदि हम उससे विनती भी करें तो हमें क्या लाभ होगा?’
16 : देखो, क्या उनका कुशल उनके हाथ में नहीं रहता? दुष्ट लोगों का विचार मुझ से दूर रहे।
17 : “कितनी बार दुष्टों का दीपक बुझता है? या उन पर विपत्ति आ पड़ती है? या परमेश्वर क्रोध करके उनके भाग में शोक देता है?
18 : क्या वे वायु से उड़ाए हुए भूसे, और बवण्डर से उड़ाई हुई भूसी के समान होते हैं?
19 : तुम कहते हो, ‘परमेश्वर उसके अधर्म का दण्ड उसके बाल–बच्चों के लिये रख छोड़ता है,’ वह उसका बदला उन्हीं को दे, ताकि वह जान ले।
20 : दुष्ट अपना नाश अपनी ही आँखों से देखे, और सर्वशक्तिमान के क्रोध में से आप पी ले।
21 : क्योंकि जब उसके महीनों की गिनती कट चुकी, तो अपने बादवाले घराने से उसका क्या काम रहा।
22 : क्या परमेश्वर को कोई ज्ञान सिखाएगा? वह तो ऊँचे पद पर रहनेवालों का भी न्याय करता है।
23 : कोई तो अपने पूरे बल में बड़े चैन और सुख से रहकर मर जाता है।
24 : उसकी देह दूध से और उसकी हड्डियाँ गूदे से भरी रहती हैं।
25 : कोई अपने जीव में कुढ़ कुढ़कर बिना सुख भोगे मर जाता है।
26 : वे दोनों एक समान मिट्टी में मिल जाते हैं, और कीड़े उन्हें ढाँक लेते हैं।
27 : “देखो, मैं तुम्हारी कल्पनाएँ जानता हूँ, और उन युक्तियों को भी, जो तुम मेरे विषय में अन्याय से करते हो।
28 : तुम कहते हो, ‘रईस का घर कहाँ रहा? दुष्टों के निवास के डेरे कहाँ रहे?’
29 : परन्तु क्या तुम ने बटोहियों से कभी नहीं पूछा? क्या तुम उनके इस विषय के प्रमाणों से अनजान हो,
30 : कि विपत्ति के दिन दुर्जन सुरक्षित रहता है; और महाप्रलय के समय ऐसे लोग बचाए जाते हैं?
31 : उसकी चाल उसके मुँह पर कौन कहेगा? उसने जो किया है उसका बदला कौन देगा?
32 : तौभी वह क़ब्र को पहुँचाया जाता है, और लोग उस क़ब्र की रखवाली करते रहते हैं।
33 : नाले के ढेले उसको सुखदायक लगते हैं; और जैसे पूर्वकाल के लोग अनगिनित जा चुके, वैसे ही सब मनुष्य उसके बाद भी चले जाएँगे।
34 : तुम्हारे उत्तरों में तो झूठ ही पाया जाता है, इसलिये तुम क्यों मुझे व्यर्थ शान्ति देते हो?”