पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
नीतिवचन
अध्याय 8
- Verse 1: क्या बुद्धि नहीं पुकारती है, क्या समझ ऊँचे शब्द से नहीं बोलती है?
- Verse 2: वह तो ऊँचे स्थानों पर मार्ग की एक ओर और तिर्मुहानियों में खड़ी होती है;
- Verse 3: फाटकों के पास नगर के पैठाव में, और द्वारों ही में वह ऊँचे स्वर से कहती है,
- Verse 4: “हे मनुष्यो, मैं तुम को पुकारती हूँ, और मेरी बात सब आदमियों के लिये है।
- Verse 5: हे भोलो, चतुराई सीखो; और हे मूर्खो, अपने मन में समझ लो।
- Verse 6: सुनो, क्योंकि मैं उत्तम बातें कहूँगी, और जब मुँह खोलूँगी, तब उससे सीधी बातें निकलेंगी;
- Verse 7: क्योंकि मुझ से सच्चाई की बातों का वर्णन होगा; दुष्टता की बातों से मुझ को घृणा आती है।
- Verse 8: मेरे मुँह की सब बातें धर्म की होती हैं, उनमें से कोई टेढ़ी या उलट फेर की बात नहीं निकलती है।
- Verse 9: समझवाले के लिये वे सब सहज, और ज्ञान प्राप्त करनेवालों के लिये अति सीधी हैं।
- Verse 10: चाँदी नहीं, मेरी शिक्षा ही को लो, और उत्तम कुन्दन से बढ़कर ज्ञान को ग्रहण करो।
- Verse 11: क्योंकि बुद्धि, मूँगे से भी अच्छी है, और सारी मनभावनी वस्तुओं में कोई भी उसके तुल्य नहीं है।
- Verse 12: मैं जो बुद्धि हूँ, चतुराई में वास करती हूँ, और ज्ञान और विवेक को प्राप्त करती हूँ।
- Verse 13: यहोवा का भय मानना बुराई से बैर रखना है। घमण्ड, अहंकार और बुरी चाल से, और उलट फेर की बात से भी मैं बैर रखती हूँ।
- Verse 14: उत्तम युक्ति, और खरी बुद्धि मेरी ही है, मैं तो समझ हूँ, और पराक्रम भी मेरा है।
- Verse 15: मेरे ही द्वारा राजा राज्य करते हैं, और अधिकारी धर्म से विचार करते हैं;
- Verse 16: मेरे ही द्वारा राजा हाकिम और रईस, और पृथ्वी के सब न्यायी शासन करते हैं।
- Verse 17: जो मुझ से प्रेम रखते हैं, उनसे मैं भी प्रेम रखती हूँ, और जो मुझ को यत्न से तड़के उठकर खोजते हैं, वे मुझे पाते हैं।
- Verse 18: धन और प्रतिष्ठा मेरे पास हैं, वरन् ठहरनेवाला धन और धर्म भी हैं।
- Verse 19: मेरा फल चोखे सोने से, वरन् कुन्दन से भी उत्तम है, और मेरी उपज उत्तम चाँदी से अच्छी है।
- Verse 20: मैं धर्म के मार्ग में, और न्याय की डगरों के बीच में चलती हूँ,
- Verse 21: जिससे मैं अपने प्रेमियों को परमार्थ का भागी करूँ, और उनके भण्डारों को भर दूँ।
- Verse 22: “यहोवा ने मुझे काम करने के आरम्भ में, वरन् अपने प्राचीनकाल के कामों से भी पहले उत्पन्न किया।
- Verse 23: मैं सदा से वरन् आदि ही से पृथ्वी की सृष्टि से पहले ही से ठहराई गई हूँ।
- Verse 24: जब न तो गहिरा सागर था और न जल के सोते थे, तब ही से मैं उत्पन्न हुई।
- Verse 25: जब पहाड़ और पहाड़ियाँ स्थिर न की गई थीं, तब ही से मैं उत्पन्न हुई।
- Verse 26: जब यहोवा ने न तो पृथ्वी और न मैदान, न जगत की धूलि के परमाणु बनाए थे, इनसे पहले मैं उत्पन्न हुई।
- Verse 27: जब उसने आकाश को स्थिर किया, तब मैं वहाँ थी, जब उसने गहिरे सागर के ऊपर आकाशमण्डल ठहराया,
- Verse 28: जब उसने आकाशमण्डल को ऊपर से स्थिर किया, और गहिरे सागर के सोते फूटने लगे,
- Verse 29: जब उसने समुद्र की सीमा ठहराई, कि जल उसकी आज्ञा का उल्लंघन न कर सके, और जब वह पृथ्वी की नींव की डोरी लगाता था,
- Verse 30: तब मैं कारीगर सी उसके पास थी; और प्रतिदिन मैं उसकी प्रसन्नता थी, और हर समय उसके सामने आनन्दित रहती थी।
- Verse 31: मैं उसकी बसाई हुई पृथ्वी से प्रसन्न थी और मेरा सुख मनुष्यों की संगति से होता था।
- Verse 32: “इसलिये अब हे मेरे पुत्रो, मेरी सुनो; क्या ही धन्य हैं वे जो मेरे मार्ग को पकड़े रहते हैं।
- Verse 33: शिक्षा को सुनो, और बुद्धिमान हो जाओ, उसके विषय में अनसुनी न करो।
- Verse 34: क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता, वरन् मेरी डेवढ़ी पर प्रतिदिन खड़ा रहता, और मेरे द्वारों के खंभों के पास दृष्टि लगाए रहता है।
- Verse 35: क्योंकि जो मुझे पाता है, वह जीवन को पाता है, और यहोवा उससे प्रसन्न होता है।
- Verse 36: परन्तु जो मेरा अपराध करता है, वह अपने ही पर उपद्रव करता है; जितने मुझ से बैर रखते वे मृत्यु से प्रीति रखते हैं।”