పరిశుద్ధ గ్రంథము
पुराना नियम
नीतिवचन
अध्याय 17
- Verse 1: चैन के साथ सूखा टुकड़ा, उस घर की अपेक्षा उत्तम है जो मेलबलि–पशुओं से भरा हो, परन्तु उसमें झगड़े–रगड़े हों।
- Verse 2: बुद्धि से चलनेवाला दास अपने स्वामी के उस पुत्र पर जो लज्जा का कारण होता है प्रभुता करेगा, और उस पुत्र के भाइयों के बीच भागी होगा।
- Verse 3: चाँदी के लिये कुठाली, और सोने के लिये भट्ठी होती है, परन्तु मनों को यहोवा जाँचता है।
- Verse 4: कुकर्मी अनर्थ बात को ध्यान देकर सुनता है, और झूठा मनुष्य दुष्टता की बात की ओर कान लगाता है।
- Verse 5: जो निर्धन को ठट्ठों में उड़ाता है, वह उसके कर्ता की निन्दा करता है; और जो किसी की विपत्ति पर हँसता है, वह निर्दोष नहीं ठहरेगा।
- Verse 6: बूढ़ों की शोभा उनके नाती पोते हैं; और बाल–बच्चों की शोभा उनके माता–पिता हैं।
- Verse 7: मूढ़ के मुख से उत्तम बात फबती नहीं, और इससे अधिक प्रधान के मुख से झूठी बात नहीं फबती।
- Verse 8: देनेवाले के हाथ में घूस मोह लेनेवाले मणि का काम देता है, ऐसा पुरुष जिधर फिरता, उधर ही उसका काम सफल होता है।
- Verse 9: जो दूसरे के अपराध को ढाँप देता, वह प्रेम का खोजी ठहरता है, परन्तु जो बात की चर्चा बार बार करता है, वह परम मित्रों में भी फूट करा देता है।
- Verse 10: एक घुड़की समझनेवाले के मन में जितनी गड़ जाती है, उतना सौ बार मार खाना मूर्ख के मन में नहीं गड़ता।
- Verse 11: बुरा मनुष्य दंगे ही का यत्न करता है, इसलिये उसके पास क्रूर दूत भेजा जाएगा।
- Verse 12: बच्चा–छीनी–हुई–रीछनी से मिलना तो भला है, परन्तु मूढ़ता में डूबे हुए मूर्ख से मिलना भला नहीं।
- Verse 13: जो कोई भलाई के बदले में बुराई करे, उसके घर से बुराई दूर न होगी।
- Verse 14: झगड़े का आरम्भ बाँध के छेद के समान है, झगड़ा बढ़ने से पहले उसको छोड़ देना उचित है।
- Verse 15: जो दोषी को निर्दोष, और जो निर्दोष को दोषी ठहराता है, उन दोनों से यहोवा घृणा करता है।
- Verse 16: बुद्धि मोल लेने के लिये मूर्ख अपने हाथ में दाम क्यों लिए है? वह उसे चाहता ही नहीं!
- Verse 17: मित्र सब समयों में प्रेम रखता है, और विपत्ति के दिन भाई बन जाता है।
- Verse 18: निर्बुद्धि मनुष्य हाथ पर हाथ मारता है, और अपने पड़ोसी के सामने उत्तरदायी होता है।
- Verse 19: जो झगड़े–रगड़े से प्रीति रखता, वह अपराध करने से भी प्रीति रखता है, और जो अपने फाटक को बड़ा करता, वह अपने विनाश के लिये यत्न करता है।
- Verse 20: जो मन का टेढ़ा है, उसका कल्याण नहीं होता, और उलट–फेर की बात करनेवाला विपत्ति में पड़ता है।
- Verse 21: जो मूर्ख को जन्म देता है वह उससे दु:ख ही पाता है; और मूढ़ के पिता को आनन्द नहीं होता।
- Verse 22: मन का आनन्द अच्छी औषधि है, परन्तु मन के टूटने से हड्डियाँ सूख जाती हैं।
- Verse 23: दुष्ट जन न्याय बिगाड़ने के लिये, अपनी गाँठ से घूस निकालता है।
- Verse 24: बुद्धि समझनेवाले के सामने ही रहती है, परन्तु मूर्ख की आँखें पृथ्वी के दूर दूर देशों में लगी रहती हैं।
- Verse 25: मूर्ख पुत्र से पिता उदास होता है, और जननी को शोक होता है।
- Verse 26: फिर धर्मी से जुर्माना लेना, और प्रधानों को खराई के कारण पिटवाना, दोनों काम अच्छे नहीं हैं।
- Verse 27: जो सम्भलकर बोलता है, वह ज्ञानी ठहरता है, और जिसकी आत्मा शान्त रहती है, वही समझवाला पुरुष ठहरता है।
- Verse 28: मूढ़ भी जब चुप रहता है, तब बुद्धिमान गिना जाता है; और जो अपना मुँह बन्द रखता वह समझवाला गिना जाता है।