P. O. C ബൈബിള്
पुराना नियम
अय्यूब
अध्याय 15
2 : “क्या बुद्धिमान को उचित है कि अज्ञानता के साथ उत्तर दे, या अपने अन्त:करण को पूरबी पवन से भरे?
3 : क्या वह निष्फल वचनों से, या व्यर्थ बातों से वाद–विवाद करे?
4 : वरन् तू परमेश्वर का भय मानना छोड़ देता, और परमेश्वर पर ध्यान लगाना औरों से छुड़ाता है।
5 : तू अपने मुँह से अपना अधर्म प्रगट करता है, और धूर्त लोगों के बोलने की रीति पर बोलता है।
6 : मैं तो नहीं परन्तु तेरा मुँह ही तुझे दोषी ठहराता है; और तेरे ही वचन तेरे विरुद्ध साक्षी देते हैं।
7 : “क्या पहला मनुष्य तू ही उत्पन्न हुआ? क्या तेरी उत्पत्ति पहाड़ों से भी पहले हुई?
8 : क्या तू परमेश्वर की सभा में बैठा सुनता था? क्या बुद्धि का ठेका तू ही ने ले रखा है?
9 : तू ऐसा क्या जानता है जिसे हम नहीं जानते? तुझ में ऐसी कौन सी समझ है जो हम में नहीं?
10 : हम लोगों में तो पक्के बालवाले और अति पुरनिये मनुष्य हैं, जो तेरे पिता से भी बहुत आयु के हैं।
11 : परमेश्वर की शान्तिदायक बातें, और जो वचन तेरे लिये कोमल हैं, क्या वे तेरी दृष्टि में तुच्छ हैं?
12 : तेरा मन क्यों तुझे खींच ले जाता है, और तू आँख से क्यों सैन करता है?
13 : तू भी अपनी आत्मा परमेश्वर के विरुद्ध करता है, और अपने मुँह से व्यर्थ बातें निकलने देता है।
14 : मनुष्य है क्या कि वह निष्कलंक हो? या जो स्त्री से उत्पन्न हुआ वह है क्या कि निर्दोष हो सके?
15 : देख, वह अपने पवित्रजनों पर भी विश्वास नहीं करता, और स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं है।
16 : फिर मनुष्य अधिक घिनौना और भ्रष्ट है, जो कुटिलता को पानी के समान पीता है।
17 : “मैं तुझे समझा दूँगा, इसलिये मेरी सुन ले, जो मैं ने देखा है, उसी का वर्णन मैं करता हूँ।
18 : (वे ही बातें जो बुद्धिमानों ने अपने पुरखाओं से सुनकर बिना छिपाए बताई हैं,
19 : केवल उन्हीं को देश दिया गया था, और उनके मध्य में कोई विदेशी आता जाता नहीं था)।
20 : दुष्ट जन जीवन भर पीड़ा से तड़पता है, और बलात्कारी के वर्षों की गिनती ठहराई हुई है।
21 : उसके कान में डरावना शब्द गूँजता रहता है, कुशल के समय भी नाश करनेवाला उस पर आ पड़ता है।
22 : उसे अन्धियारे में से फिर निकलने की कुछ आशा नहीं होती, और तलवार उसकी घात में रहती है।
23 : वह रोटी के लिये मारा मारा फिरता है, कि कहाँ मिलेगी। उसे निश्चय रहता है कि अन्धकार का दिन मेरे पास ही है।
24 : संकट और दुर्घटना से उसको डर लगता रहता है; ऐसे राजा के समान जो युद्ध के लिये तैयार हो, वे उस पर प्रबल होते हैं।
25 : क्योंकि उसने तो परमेश्वर के विरुद्ध हाथ बढ़ाया है, और सर्वशक्तिमान के विरुद्ध वह ताल ठोंकता है,
26 : और सिर उठाकर और अपनी मोटी मोटी ढालें दिखाता हुआ, घमण्ड से उस पर धावा करता है;
27 : इसलिये कि उसके मुँह पर चिकनाई छा गई है, और उसकी कमर में चर्बी जमी है,
28 : और वह उजाड़े हुए नगरों में बस गया है, और जो घर रहने योग्य नहीं, और खण्डहर होने को छोड़े गए हैं, उनमें बस गया है;
29 : वह धनी न रहेगा, और न उसकी सम्पत्ति बनी रहेगी, और ऐसे लोगों के खेत की उपज भूमि की ओर न झुकने पाएगी;
30 : वह अन्धियारे से कभी न निकलेगा; और उसकी डालियाँ आग की लपट से झुलस जाएँगी, और परमेश्वर के मुँह की श्वास से वह उड़ जाएगा।
31 : वह व्यर्थ बातों का भरोसा करके अपने को धोखा न दे, क्योंकि उसका बदला धोखा ही होगा।
32 : यह उसके नियत दिन से पहले पूरा हो जाएगा; उसकी डालियाँ हरी न रहेंगी।
33 : दाख के समान उसके कच्चे फल झड़ जाएँगे, और उसके फूल जैतून के वृक्ष के से गिरेंगे।
34 : क्योंकि भक्तिहीन के परिवार से कुछ बन न पड़ेगा, और जो घूस लेते हैं, उनके तम्बू आग से जल जाएँगे।
35 : उनको उपद्रव का गर्भ रहता, और वे अनर्थ को जन्म देते हैं : और वे अपने अन्त:करण में छल की बातें गढ़ते हैं।”