P. O. C ബൈബിള്
पुराना नियम
उत्पत्ति
अध्याय 30
- Verse 1: जब राहेल ने देखा कि याक़ूब के लिये मुझ से कोई सन्तान नहीं होती, तब वह अपनी बहिन से डाह करने लगी और याक़ूब से कहा, “मुझे भी सन्तान दे, नहीं तो मर जाऊँगी।”
- Verse 2: तब याक़ूब ने राहेल से क्रोधित होकर कहा, “क्या मैं परमेश्वर हूँ? तेरी कोख तो उसी ने बन्द कर रखी है।”
- Verse 3: राहेल ने कहा, “अच्छा, मेरी दासी बिल्हा हाजिर है; उसी के पास जा, वह मेरे घुटनों पर जनेगी, और उसके द्वारा मेरा भी घर बसेगा।”
- Verse 4: तब उसने उसे अपनी दासी बिल्हा को दिया कि वह उसकी पत्नी हो; और याक़ूब उसके पास गया।
- Verse 5: और बिल्हा गर्भवती हुई और याक़ूब से उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
- Verse 6: तब राहेल ने कहा, “परमेश्वर ने मेरा न्याय चुकाया और मेरी सुनकर मुझे एक पुत्र दिया।” इसलिये उसने उसका नाम दान रखा।
- Verse 7: राहेल की दासी बिल्हा फिर गर्भवती हुई और याक़ूब से एक पुत्र और उत्पन्न हुआ।
- Verse 8: तब राहेल ने कहा, “मैं ने अपनी बहिन के साथ बड़े बल से लिपटकर मल्लयुद्ध किया और अब जीत गई।” अत: उसने उसका नाम नप्ताली रखा।
- Verse 9: जब लिआ: ने देखा कि मैं जनने से रहित हो गई हूँ, तब उसने अपनी दासी जिल्पा को लेकर याक़ूब की पत्नी होने के लिये दे दिया।
- Verse 10: और लिआ: की दासी जिल्पा के भी याक़ूब से एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
- Verse 11: तब लिआ: ने कहा, “अहो भाग्य!” इसलिये उसने उसका नाम गाद रखा।
- Verse 12: फिर लिआ: की दासी जिल्पा के याक़ूब से एक और पुत्र उत्पन्न हुआ।
- Verse 13: तब लिआ: ने कहा, “मैं धन्य हूँ; निश्चय स्त्रियाँ मुझे धन्य कहेंगी।” इसलिये उसने उसका नाम आशेर रखा।
- Verse 14: गेहूँ की कटनी के दिनों में रूबेन को मैदान में दूदाफल मिले, और वह उनको अपनी माता लिआ: के पास ले गया। तब राहेल ने लिआ: से कहा, “अपने पुत्र के दूदाफलों में से कुछ मुझे दे।”
- Verse 15: उसने उससे कहा, “तू ने जो मेरे पति को ले लिया है क्या यह छोटी बात है? अब क्या तू मेरे पुत्र के दूदाफल भी लेना चाहती है?” राहेल ने कहा, “अच्छा, तेरे पुत्र के दूदाफलों के बदले वह आज रात को तेरे संग सोएगा।”
- Verse 16: साँझ को जब याक़ूब मैदान से आ रहा था, तब लिआ: उससे भेंट करने को निकली, और कहा, “तुझे मेरे ही पास आना होगा, क्योंकि मैं ने अपने पुत्र के दूदाफल देकर तुझे सचमुच मोल लिया।” तब वह उस रात को उसी के संग सोया।
- Verse 17: तब परमेश्वर ने लिआ: की सुनी, और वह गर्भवती हुई और याक़ूब से उसके पाँचवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ।
- Verse 18: तब लिआ: ने कहा, “मैं ने जो अपने पति को अपनी दासी दी, इसलिये परमेश्वर ने मुझे मेरी मजदूरी दी है।” इसलिये उसने उसका नाम इस्साकार रखा।
- Verse 19: लिआ: फिर गर्भवती हुई और याक़ूब से उसके छठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ।
- Verse 20: तब लिआ: ने कहा, “परमेश्वर ने मुझे अच्छा दान दिया है; अब की बार मेरा पति मेरे संग बना रहेगा, क्योंकि मेरे उससे छ: पुत्र उत्पन्न हो चुके हैं।” इसलिये उसने उसका नाम जबूलून् रखा।
- Verse 21: तत्पश्चात् उसके एक बेटी भी हुई, और उसने उसका नाम दीना रखा।
- Verse 22: परमेश्वर ने राहेल की भी सुधि ली, और उसकी सुनकर उसकी कोख खोली।
- Verse 23: इसलिये वह गर्भवती हुई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया, तब उसने कहा, “परमेश्वर ने मेरी नामधराई को दूर कर दिया है।”
- Verse 24: इसलिए उसने यह कहकर उसका नाम यूसुफ रखा, “परमेश्वर मुझे एक पुत्र और भी देगा।”
- Verse 25: जब राहेल से यूसुफ उत्पन्न हुआ, तब याक़ूब ने लाबान से कहा, “मुझे विदा कर कि मैं अपने देश और स्थान को जाऊँ।
- Verse 26: मेरी स्त्रियाँ और मेरे बच्चे, जिनके लिये मैं ने तेरी सेवा की है, उन्हें मुझे दे कि मैं चला जाऊँ; तू तो जानता है कि मैं ने तेरी कैसी सेवा की है।”
- Verse 27: लाबान ने उससे कहा, “यदि तेरी दृष्टि में मैं ने अनुग्रह पाया है, तो यहीं रह जा; क्योंकि मैं ने अनुभव से जान लिया है कि यहोवा ने तेरे कारण से मुझे आशीष दी है।”
- Verse 28: फिर उसने कहा, “तू ठीक बता कि मैं तुझ को क्या दूँ, और मैं उसे दूँगा।”
- Verse 29: उसने उससे कहा, “तू जानता है कि मैं ने तेरी कैसी सेवा की, और तेरे पशु मेरे पास किस प्रकार से रहे।
- Verse 30: मेरे आने से पहले वे कितने थे, और अब कितने हो गए हैं; और यहोवा ने मेरे आने पर तुझे आशीष दी है। पर मैं अपने घर का काम कब करने पाऊँगा?”
- Verse 31: उसने फिर कहा, “मैं तुझे क्या दूँ?” याक़ूब ने कहा, “तू मुझे कुछ न दे; यदि तू मेरे लिये एक काम करे, तो मैं फिर तेरी भेड़–बकरियों को चराऊँगा, और उनकी रक्षा करूँगा।
- Verse 32: मैं आज तेरी सब भेड़–बकरियों के बीच होकर निकलूँगा, और जो भेड़ या बकरी चित्तीवाली और चितकबरी हो, और जो भेड़ काली हो, और जो बकरी चितकबरी और चित्तीवाली हो, उन्हें मैं अलग कर रखूँगा; और मेरी मजदूरी में वे ही ठहरेंगी।
- Verse 33: और जब आगे को मेरी मज़दूरी की चर्चा तेरे सामने चले, तब धर्म की यही साक्षी होगी; अर्थात् बकरियों में से जो कोई न चित्तीवाली न चितकबरी हो, और भेड़ों में से जो कोई काली न हो, यदि मेरे पास निकलें तो चोरी की ठहरेंगी।”
- Verse 34: तब लाबान ने कहा, “तेरे कहने के अनुसार हो।”
- Verse 35: अत: उसने उसी दिन सब धारीवाले और चितकबरे बकरों, और सब चित्तीवाली और चितकबरी बकरियों को, अर्थात् जिनमें कुछ उजलापन था, उनको और सब काली भेड़ों को भी अलग करके अपने पुत्रों के हाथ सौंप दिया;
- Verse 36: और उसने अपने और याक़ूब के बीच में तीन दिन के मार्ग का अन्तर ठहराया; और याक़ूब लाबान की भेड़–बकरियों को चराने लगा।
- Verse 37: तब याक़ूब ने चिनार, और बादाम, और अर्मोन वृक्षों की हरी–हरी छड़ियाँ लेकर, उनके छिलके कहीं कहीं छील के, उन्हें धारीदार बना दिया, ऐसी कि उन छड़ियों की सफेदी दिखाई देने लगी।
- Verse 38: तब छीली हुई छड़ियों को भेड़–बकरियों के सामने उनके पानी पीने के कठौतों में खड़ा किया; और जब वे पानी पीने के लिये आईं तब गाभिन हो गईं।
- Verse 39: छड़ियों के सामने गाभिन होकर, भेड़–बकरियाँ धारीवाले, चित्तीवाले और चितकबरे बच्चे जनीं।
- Verse 40: तब याक़ूब ने भेड़ों के बच्चों को अलग–अलग किया, और लाबान की भेड़–बकरियों के मुँह को चित्तीवाले और सब काले बच्चों की ओर कर दिया; और अपने झुण्डों को उनसे अलग रखा, और लाबान की भेड़–बकरियों से मिलने न दिया।
- Verse 41: और जब जब बलवन्त भेड़–बकरियाँ गाभिन होती थीं, तब तब याक़ूब उन छड़ियों को कठौतों में उनके सामने रख देता था; जिससे वे छड़ियों को देखती हुई गाभिन हो जाएँ।
- Verse 42: पर जब निर्बल भेड़–बकरियाँ गाभिन होती थीं, तब वह उन्हें उनके आगे नहीं रखता था। इससे निर्बल निर्बल लाबान की रहीं, और बलवन्त बलवन्त याक़ूब की हो गईं।
- Verse 43: इस प्रकार वह पुरुष अत्यन्त धनाढ्य हो गया, और उसके बहुत सी भेड़–बकरियाँ, और दासियाँ और दास, और ऊँट और गदहे हो गए।