पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
यहेजकेल
अध्याय 1
- Verse 1: तीसवें वर्ष के चौथे महीने के पाँचवें दिन, मैं बन्दियों के बीच कबार नदी के तट पर था, तब स्वर्ग खुल गया, और मैं ने परमेश्वर के दर्शन पाए।
- Verse 2: यहोयाकीन राजा की बँधुआई के पाँचवें वर्ष के चौथे महीने के पाँचवें दिन को, कसदियों के देश में कबार नदी के तट पर,
- Verse 3: यहोवा का वचन बूजी के पुत्र यहेजकेल याजक के पास पहुँचा; और यहोवा की शक्ति उस पर वहीं प्रगट हुई।
- Verse 4: जब मैं देखने लगा, तो क्या देखता हूँ कि उत्तर दिशा से बड़ी घटा, और लहराती हुई आग सहित बड़ी आँधी आ रही है, और घटा के चारों ओर प्रकाश और आग के बीचों–बीच से झलकाया हुआ पीतल सा कुछ दिखाई देता है।
- Verse 5: और उसके बीच से चार जीवधारियों के समान कुछ निकले। उनका रूप मनुष्य के समान था,
- Verse 6: परन्तु उन में से हर एक के चार चार मुख और चार चार पंख थे।
- Verse 7: उनके पाँव सीधे थे, और उनके पाँवों के तलुए बछड़ों के खुरों के से थे; और वे झलकाए हुए पीतल के समान चमकते थे।
- Verse 8: उनके चारों ओर पंखों के नीचे मनुष्य के से हाथ थे। उन चारों के मुख और पंख इस प्रकार के थे :
- Verse 9: उनके पंख एक दूसरे से परस्पर मिले हुए थे; वे अपने अपने सामने सीधे ही चलते हुए मुड़ते नहीं थे।
- Verse 10: उनके सामने के मुखों का रूप मनुष्य का सा था और उन चारों के दाहिनी ओर के मुख सिंह के से, बाईं ओर के मुख बैल के से थे, और चारों के पीछे के मुख उकाब पक्षी के से थे।
- Verse 11: उनके चेहरे ऐसे ही थे। उनके मुख और पंख ऊपर की ओर अलग अलग थे, हर एक जीवधारी के दो दो पंख थे, जो एक दूसरे के पंखों से मिले हुए थे, और दो दो पंखों से उनका शरीर ढँपा हुआ था।
- Verse 12: वे सीधे अपने अपने सामने ही चलते थे; जिधर आत्मा जाना चाहता था, वे उधर ही जाते थे, और चलते समय मुड़ते नहीं थे।
- Verse 13: जीवधारियों के रूप अंगारों और जलती हुई मशालों के समान दिखाई देते थे, और वह आग जीवधारियों के बीच इधर उधर चलती फिरती हुई बड़ा प्रकाश देती रही; और उस आग से बिजली निकलती थी।
- Verse 14: जीवधारियों का चलना–फिरना बिजली का सा था।
- Verse 15: जब मैं जीवधारियों को देख ही रहा था, तो क्या देखा कि भूमि पर उनके पास चारों मुखों की गिनती के अनुसार, एक एक पहिया था।
- Verse 16: पहियों का रूप और बनावट फीरोज़े की सी थी, और चारों का एक ही रूप था; और उनका रूप और बनावट ऐसी थी जैसे एक पहिये के बीच दूसरा पहिया हो।
- Verse 17: चलते समय वे अपने चारों ओर चल सकते थे, और चलने में मुड़ते नहीं थे।
- Verse 18: उन चारों पहियों के घेरे बहुत बड़े और डरावने थे, और उनके घेरों में चारों ओर आँखें ही आँखें भरी हुई थीं।
- Verse 19: जब जीवधारी चलते थे, तब पहिये भी उनके साथ चलते थे; और जब जीवधारी भूमि पर से उठते थे, तब पहिये भी उठते थे।
- Verse 20: जिधर आत्मा जाना चाहती थी, उधर ही वे जाते, और पहिये जीवधारियों के साथ उठते थे; क्योंकि उनकी आत्मा पहियों में थी।
- Verse 21: जब वे चलते थे तब ये भी चलते थे; और जब जब वे खड़े होते थे तब ये भी खड़े होते थे; और जब वे भूमि पर से उठते थे तब पहिये भी उनके साथ उठते थे; क्योंकि जीवधारियों की आत्मा पहियों में थी।
- Verse 22: जीवधारियों के सिरों के ऊपर आकाश–मण्डल सा–कुछ था जो बर्फ के समान भयानक रीति से चमकता था, और वह उनके सिरों के ऊपर फैला हुआ था।
- Verse 23: आकाशमण्डल के नीचे, उनके पंख एक दूसरे की ओर सीधे फैले हुए थे; और हर एक जीवधारी के दो दो और पंख थे जिन से उनके शरीर ढँपे हुए थे।
- Verse 24: उनके चलते समय उनके पंखों की फडफ़ड़ाहट की आहट मुझे बहुत से जल, या सर्वशक्तिमान की वाणी, या सेना के हलचल की सी सुनाई पड़ती थी; और जब वे खड़े होते थे, तब अपने पंख लटका देते थे।
- Verse 25: फिर उनके सिरों के ऊपर जो आकाशमण्डल था, उसके ऊपर से एक शब्द सुनाई पड़ता था; और जब वे खड़े होते थे, तब अपने पंख लटका लेते थे।
- Verse 26: जो आकाशमण्डल उनके सिरों के ऊपर था, उसके ऊपर मानो कुछ नीलम का बना हुआ सिंहासन था; इस सिंहासन के ऊपर मनुष्य के समान कोई दिखाई देता था।
- Verse 27: उसकी कमर से लेकर ऊपर की ओर मुझे मानो झलकाया हुआ पीतल–सा दिखाई पड़ा, और उसके भीतर और चारों ओर आग–सी दिखाई पड़ती थी; फिर उस मनुष्य की कमर से लेकर नीचे की ओर भी मुझे कुछ आग–सी दिखाई पड़ती थी; और उसके चारों ओर प्रकाश था।
- Verse 28: जैसे वर्षा के दिन बादल में धनुष दिखाई पड़ता है, वैसे ही चारों ओर का प्रकाश दिखाई देता था। यहोवा के तेज का रूप ऐसा ही था। उसे देखकर, मैं मुँह के बल गिरा, तब मैं ने एक शब्द सुना जैसे कोई बातें करता है।