पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
उत्पत्ति
अध्याय 27
- Verse 1: जब इसहाक बूढ़ा हो गया, और उसकी आँखें ऐसी धुंधली पड़ गईं कि उसको सूझता न था, तब उसने अपने जेठे पुत्र एसाव को बुलाकर कहा, “हे मेरे पुत्र,” उसने कहा, “क्या आज्ञा।”
- Verse 2: उसने कहा, “सुन, मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, और नहीं जानता कि मेरी मृत्यु का दिन कब होगा :
- Verse 3: इसलिये अब तू अपना तरकश और धनुष आदि हथियार लेकर मैदान में जा, और मेरे लिये अहेर कर ले आ।
- Verse 4: तब मेरी रुचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बनाकर मेरे पास ले आना, कि मैं उसे खाकर मरने से पहले तुझे जी भर के आशीर्वाद दूँ।”
- Verse 5: तब एसाव अहेर करने को मैदान में गया। जब इसहाक एसाव से यह बात कह रहा था, तब रिबका सुन रही थी।
- Verse 6: इसलिये उसने अपने पुत्र याक़ूब से कहा, “सुन, मैं ने तेरे पिता को तेरे भाई एसाव से यह कहते सुना है,
- Verse 7: ‘तू मेरे लिये अहेर करके उसका स्वादिष्ट भोजन बना, कि मैं उसे खाकर तुझे यहोवा के आगे मरने से पहले आशीर्वाद दूँ।’
- Verse 8: इसलिये अब, हे मेरे पुत्र, मेरी सुन, और यह आज्ञा मान,
- Verse 9: कि बकरियों के पास जाकर बकरियों के दो अच्छे अच्छे बच्चे ले आ; और मैं तेरे पिता के लिये उसकी रुचि के अनुसार उनके मांस का स्वादिष्ट भोजन बनाऊँगी।
- Verse 10: तब तू उसको अपने पिता के पास ले जाना, कि वह उसे खाकर मरने से पहले तुझ को आशीर्वाद दे।”
- Verse 11: याक़ूब ने अपनी माता रिबका से कहा, “सुन, मेरा भाई एसाव तो रोंआर पुरुष है, और मैं रोमहीन पुरुष हूँ।
- Verse 12: कदाचित् मेरा पिता मुझे टटोलने लगे, तो मैं उसकी दृष्टि में ठग ठहरूँगा; और आशीष के बदले शाप ही कमाऊँगा।”
- Verse 13: उसकी माता ने उससे कहा, “हे मेरे पुत्र, शाप तुझ पर नहीं मुझी पर पड़े, तू केवल मेरी सुन, और जाकर वे बच्चे मेरे पास ले आ।”
- Verse 14: तब याक़ूब जाकर उनको अपनी माता के पास ले आया, और माता ने उसके पिता की रुचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बना दिया।
- Verse 15: तब रिबका ने अपने पहलौठे पुत्र एसाव के सुन्दर वस्त्र, जो उसके पास घर में थे, लेकर अपने छोटे पुत्र याक़ूब को पहिना दिए;
- Verse 16: और बकरियों के बच्चों की खालों को उसके हाथों में और उसके चिकने गले में लपेट दिया;
- Verse 17: और वह स्वादिष्ट भोजन और अपनी बनाई हुई रोटी भी अपने पुत्र याक़ूब के हाथ में दे दी।
- Verse 18: तब वह अपने पिता के पास गया और कहा, “हे मेरे पिता,” उसने कहा, “क्या बात है? हे मेरे पुत्र, तू कौन है?”
- Verse 19: याक़ूब ने अपने पिता से कहा, “मैं तेरा जेठा पुत्र एसाव हूँ। मैं ने तेरी आज्ञा के अनुसार किया है; इसलिये उठ और बैठकर मेरे अहेर के मांस में से खा, कि तू जी से मुझे आशीर्वाद दे।”
- Verse 20: इसहाक ने अपने पुत्र से कहा, “हे मेरे पुत्र, क्या कारण है कि वह तुझे इतनी जल्दी मिल गया?” उसने यह उत्तर दिया, “तेरे परमेश्वर यहोवा ने उसको मेरे सामने कर दिया।”
- Verse 21: फिर इसहाक ने याक़ूब से कहा, “हे मेरे पुत्र, निकट आ, मैं तुझे टटोलकर जानूँ कि तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है कि नहीं।”
- Verse 22: तब याक़ूब अपने पिता इसहाक के निकट गया, और उसने उसको टटोलकर कहा, “बोल तो याक़ूब का सा है, पर हाथ एसाव ही के से जान पड़ते हैं।”
- Verse 23: और उसने उसको नहीं पहचाना, क्योंकि उसके हाथ उसके भाई के से रोंआर थे; अत: उसने उसको आशीर्वाद दिया।
- Verse 24: और उसने पूछा, “क्या तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है?” उसने कहा, “हाँ, मैं हूँ।”
- Verse 25: तब उसने कहा, “भोजन को मेरे निकट ले आ, कि मैं अपने पुत्र के अहेर के मांस में से खाकर, तुझे जी से आशीर्वाद दूँ।” तब वह उसको उसके निकट ले आया, और उसने खाया; और वह उसके पास दाखमधु भी लाया, और उसने पिया।
- Verse 26: तब उसके पिता इसहाक ने उससे कहा, “हे मेरे पुत्र, निकट आकर मुझे चूम।”
- Verse 27: उसने निकट जाकर उसको चूमा; और उसने उसके वस्त्रों का सुगन्ध पाकर उसको यह आशीर्वाद दिया, “देख, मेरे पुत्र की सुगन्ध जो ऐसे खेत की सी है जिस पर यहोवा ने आशीष दी हो;
- Verse 28: परमेश्वर तुझे आकाश से ओस, और भूमि की उत्तम से उत्तम उपज, और बहुत सा अनाज और नया दाखमधु दे।
- Verse 29: राज्य राज्य के लोग तेरे अधीन हों, और देश देश के लोग तुझे दण्डवत् करें। तू अपने भाइयों का स्वामी हो, और तेरी माता के पुत्र तुझे दण्डवत् करें। जो तुझे शाप दें वे आप ही शापित हों, और जो तुझे आशीर्वाद दें वे आशीष पाएँ।”
- Verse 30: जैसे ही यह आशीर्वाद इसहाक याक़ूब को दे चुका, और याक़ूब अपने पिता इसहाक के सामने से निकला ही था, कि एसाव अहेर लेकर आ पहुँचा।
- Verse 31: तब वह भी स्वादिष्ट भोजन बनाकर अपने पिता के पास ले आया, और उससे कहा, “हे मेरे पिता, उठकर अपने पुत्र के अहेर का मांस खा, ताकि मुझे जी से आशीर्वाद दे।”
- Verse 32: उसके पिता इसहाक ने पूछा, “तू कौन है?” उसने कहा, “मैं तेरा जेठा पुत्र एसाव हूँ।”
- Verse 33: तब इसहाक ने अत्यन्त थरथर काँपते हुए कहा, “फिर वह कौन था जो अहेर करके मेरे पास ले आया था, और मैं ने तेरे आने से पहले सब में से कुछ कुछ खा लिया और उसको आशीर्वाद दिया? अब उसको आशीष लगी भी रहेगी।”
- Verse 34: अपने पिता की यह बात सुनते ही एसाव ने अत्यन्त ऊँचे और दु:ख भरे स्वर से चिल्लाकर अपने पिता से कहा, “हे मेरे पिता, मुझको भी आशीर्वाद दे!”
- Verse 35: उसने कहा, “तेरा भाई धूर्तता से आया, और तेरे आशीर्वाद को ले के चला गया।”
- Verse 36: उसने कहा, “क्या उसका नाम याक़ूब यथार्थ नहीं रखा गया? उसने मुझे दो बार अड़ंगा मारा। मेरा पहिलौठे का अधिकार तो उसने ले ही लिया था; और अब देख, उसने मेरा आशीर्वाद भी ले लिया है।” फिर उसने कहा, “क्या तू ने मेरे लिये भी कोई आशीर्वाद नहीं सोच रखा है?”
- Verse 37: इसहाक ने एसाव को उत्तर देकर कहा, “सुन, मैं ने उसको तेरा स्वामी ठहराया, और उसके सब भाइयों को उसके अधीन कर दिया, और अनाज और नया दाखमधु देकर उसको पुष्ट किया है। इसलिये अब, हे मेरे पुत्र, मैं तेरे लिये क्या करूँ?”
- Verse 38: एसाव ने अपने पिता से कहा, “हे मेरे पिता, क्या तेरे मन में एक ही आशीर्वाद है? हे मेरे पिता, मुझ को भी आशीर्वाद दे।” यों कहकर एसाव फूट फूटके रोया।
- Verse 39: उसके पिता इसहाक ने उससे कहा, “सुन, तेरा निवास उपजाऊ भूमि से दूर हो, और ऊपर से आकाश की ओस उस पर न पड़े।
- Verse 40: तू अपनी तलवार के बल से जीवित रहे, और अपने भाई के अधीन तो हो; पर जब तू स्वाधीन हो जाएगा, तब उसके जूए को अपने कन्धे पर से तोड़ फेंके।”
- Verse 41: एसाव ने तो याक़ूब से अपने पिता के दिए हुए आशीर्वाद के कारण बैर रखा; और उसने सोचा, “मेरे पिता के अन्तकाल का दिन निकट है, फिर मैं अपने भाई याक़ूब को घात करूँगा।”
- Verse 42: जब रिबका को उसके पहिलौठे पुत्र एसाव की ये बातें बताई गईं, तब उसने अपने छोटे पुत्र याक़ूब को बुलाकर कहा, “सुन, तेरा भाई एसाव तुझे घात करने के लिये अपने मन में धीरज रखे हुए है।
- Verse 43: इसलिये अब, हे मेरे पुत्र, मेरी सुन, और हारान को मेरे भाई लाबान के पास भाग जा;
- Verse 44: और थोड़े दिन तक, अर्थात् जब तक तेरे भाई का क्रोध न उतरे तब तक उसी के पास रहना।
- Verse 45: फिर जब तेरे भाई का क्रोध तुझ पर से उतरे, और जो काम तू ने उस से किया है उसको वह भूल जाए; तब मैं तुझे वहाँ से बुलवा भेजूँगी। ऐसा क्यों हो कि एक ही दिन में मुझे तुम दोनों से रहित होना पड़े?”
- Verse 46: फिर रिबका ने इसहाक से कहा, “हित्ती लड़कियों के कारण मैं अपने प्राण से घिन करती हूँ; इसलिये यदि ऐसी हित्ती लड़कियों में से, जैसी इस देश की लड़कियाँ हैं, याक़ूब भी एक से कहीं विवाह कर ले, तो मेरे जीवन में क्या लाभ होगा?”