ಕನ್ನಡ ಸತ್ಯವೇದವು
पुराना नियम
अय्यूब
अध्याय 9
2 : “मैं निश्चय जानता हूँ कि बात ऐसी ही है; परन्तु मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में कैसे धर्मी ठहर सकता है?
3 : चाहे वह उससे मुक़द्दमा लड़ना भी चाहे तौभी मनुष्य हज़ार बातों में से एक का भी उत्तर न दे सकेगा।
4 : वह बुद्धिमान और अति सामर्थी है : उसके विरोध में हठ करके कौन कभी प्रबल हुआ है?
5 : वह तो पर्वतों को अचानक हटा देता है और उन्हें पता भी नहीं लगता, वह क्रोध में आकर उन्हें उलट–पुलट कर देता है।
6 : वह पृथ्वी को हिलाकर उसके स्थान से अलग करता है, और उसके खम्भे काँपने लगते हैं।
7 : उसकी आज्ञा बिना सूर्य उदय होता ही नहीं; और वह तारों पर मुहर लगाता है;
8 : वह आकाशमण्डल को अकेला ही फैलाता है, और समुद्र की ऊँची ऊँची लहरों पर चलता है;
9 : वह सप्तर्षि, मृगशिरा और कचपचिया और दक्षिण के नक्षत्रों का बनानेवाला है।
10 : वह तो ऐसे बड़े कर्म करता है, जिनकी थाह नहीं लगती; और इतने आश्चर्यकर्म करता है, जो गिने नहीं जा सकते।
11 : देखो, वह मेरे सामने से होकर तो चलता है परन्तु मुझको नहीं दिखाई पड़ता; और आगे को बढ़ जाता है, परन्तु मुझे सूझ ही नहीं पड़ता है।
12 : देखो, जब वह छीनने लगे, तब उसको कौन रोकेगा? कौन उससे कह सकता है कि तू यह क्या करता है?
13 : “परमेश्वर अपना क्रोध ठंडा नहीं करता। अभिमानी के सहायकों को उसके पाँव तले झुकना पड़ता है।
14 : फिर मैं क्या हूँ, जो उसे उत्तर दूँ, और बातें छाँट छाँटकर उस से विवाद करूँ?
15 : चाहे मैं निर्दोष भी होता, तौभी उसको उत्तर न दे सकता; मैं अपने मुद्दई से गिड़गिड़ाकर ही विनती कर सकता हूँ।
16 : चाहे मेरे पुकारने से वह उत्तर भी देता, तौभी मैं इस बात की प्रतीति न करता कि वह मेरी बात सुनता है।
17 : वह आँधी चलाकर मुझे तोड़ डालता है, और बिना कारण मेरे चोट पर चोट लगाता है।
18 : वह मुझे साँस भी लेने नहीं देता है, और मुझे कड़वाहट से भरता है।
19 : जो सामर्थ्य की चर्चा हो, तो देखो, वह बलवान है : और यदि न्याय की चर्चा हो, तो वह कहेगा मुझ से कौन मुक़द्दमा लड़ेगा?
20 : चाहे मैं निर्दोष ही क्यों न हूँ, परन्तु अपने ही मुँह से दोषी ठहरूँगा; खरा होने पर भी वह मुझे कुटिल ठहराएगा।
21 : मैं खरा तो हूँ, परन्तु अपना भेद नहीं जानता; अपने जीवन से मुझे घृणा आती है।
22 : बात तो एक ही है, इस से मैं यह कहता हूँ कि परमेश्वर खरे और दुष्ट दोनों का नाश करता है।
23 : जब लोग विपत्ति से अचानक मरने लगते हैं तब वह निर्दोष लोगों के जाँचे जाने पर हँसता है।
24 : देश दुष्टों के हाथ में दिया गया है। वह उसके न्यायियों की आँखों को बन्द कर देता है; इसका करनेवाला वही न हो तो कौन है?
25 : “मेरे दिन हरकारे से भी अधिक वेग से चले जाते हैं; वे भागे जाते हैं और उनको कल्याण कुछ भी दिखाई नहीं देता।
26 : वे तेजी से सरकंडों की नावों के समान चले जाते हैं, या अहेर पर झपटते हुए उक़ाब के समान।
27 : जो मैं कहूँ, ‘मैं विलाप करना भूल जाऊँगा, और उदासी छोड़कर अपना मन प्रफुल्लित कर लूँगा,’
28 : तो मैं अपने सब दु:खों से डरता हूँ, मैं तो जानता हूँ कि तू मुझे निर्दोष न ठहराएगा।
29 : मैं तो दोषी ठहरूँगा; फिर व्यर्थ क्यों परिश्रम करूँ?
30 : चाहे मैं हिम में स्नान करूँ, और अपने हाथ खार से निर्मल करूँ,
31 : तौभी तू मुझे गड़हे में डाल ही देगा, और मेरे वस्त्र भी मुझ से घृणा करेंगे।
32 : क्योंकि वह मेरे तुल्य मनुष्य नहीं है कि मैं उससे वादविवाद कर सकूँ, और हम दोनों एक दूसरे से मुक़द्दमा लड़ सकें।
33 : हम दोनों के बीच कोई बिचवई नहीं है, जो हम दोनों पर अपना हाथ रखे।
34 : वह अपना सोंटा मुझ पर से दूर करे और उसकी भय देनेवाली बात मुझे न घबराए।
35 : तब मैं उस से निडर होकर कुछ कह सकूँगा, क्योंकि मैं अपनी दृष्टि में ऐसा नहीं हूँ।