P. O. C ബൈബിള്
पुराना नियम
न्यायियों
अध्याय 16
- Verse 1: तब शिमशोन गाज़ा को गया, और वहाँ एक वेश्या को देखकर उसके पास गया।
- Verse 2: जब गाज़ावासियों को इसका समाचार मिला कि शिमशोन यहाँ आया है, तब उन्होंने उसको घेर लिया, और रात भर नगर के फाटक पर उसकी घात में लगे रहे; और यह कहकर रात भर चुपचाप रहे, कि भोर होते ही हम उसको घात करेंगे।
- Verse 3: परन्तु शिमशोन आधी रात तक पड़ा रहा, और आधी रात को उठकर, उसने नगर के फाटक के दोनों पल्लों और दोनों बाजुओं को पकड़कर बेंड़ों समेत उखाड़ लिया, और अपने कन्धों पर रखकर उन्हें उस पहाड़ की चोटी पर ले गया, जो हेब्रोन के सामने है।
- Verse 4: इसके बाद वह सोरेक नामक घाटी में रहनेवाली दलीला नामक एक स्त्री से प्रीति करने लगा।
- Verse 5: तब पलिश्तियों के सरदारों ने उस स्त्री के पास जा के कहा, “तू उसको फुसलाकर पूछ कि उसके महाबल का भेद क्या है, और कौन सा उपाय करके हम उस पर ऐसे प्रबल हों, कि उसे बाँधकर दबा रखें; तब हम तुझे ग्यारह ग्यारह सौ टुकड़े चाँदी देंगे।”
- Verse 6: तब दलीला ने शिमशोन से कहा, “मुझे बता कि तेरे बड़े बल का भेद क्या है, और किस रीती से कोई तुझे बाँधकर दबा रख सकता है।”
- Verse 7: शिमशोन ने उससे कहा, “यदि मैं सात ऐसी नई नई ताँतों से बाँधा जाऊँ जो सुखाई न गई हों, तो मेरा बल घट जायेगा, और मैं साधारण मनुष्य के समान हो जाऊँगा।”
- Verse 8: तब पलिश्तियों के सरदार दलीला के पास ऐसी नई नई सात ताँतें ले गए जो सुखाई न गई थीं, और उनसे उसने शिमशोन को बाँधा।
- Verse 9: उसके पास कुछ मनुष्य कोठरी में घात लगाए बैठे थे। तब उसने उस से कहा, “हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” तब उसने ताँतों को ऐसा तोड़ा जैसा सन का सूत आग से छूते ही टूट जाता है। और उसके बल का भेद न खुला।
- Verse 10: तब दलीला ने शिमशोन से कहा, “सुन, तू ने तो मुझ से छल किया, और झूठ कहा है; अब मुझे बता दे कि तू किस वस्तु से बंध सकता है।”
- Verse 11: उसने उससे कहा, “यदि मैं ऐसी नई नई रस्सियों से जो किसी काम में न आईं हों कसकर बाँधा जाऊँ, तो मेरा बल घट जाएगा, और मैं साधारण मनुष्य के समान हो जाऊँगा।”
- Verse 12: तब दलीला ने नई नई रस्सियाँ लेकर और उसको बाँधकर कहा, “हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” कितने मनुष्य उस कोठरी में घात लगाए हुए थे। तब उसने उनको सूत के समान अपनी भुजाओं पर से तोड़ डाला।
- Verse 13: तब दलीला ने शिमशोन से कहा, “अब तक तू मुझ से छल करता, और झूठ बोलता आया है; अब मुझे बता दे कि तू काहे से बंध सकता है?” उसने कहा, “यदि तू मेरे सिर की सातों लटें ताने में बुने तो बंध सकूँगा।”
- Verse 14: अत: उसने उसे खूँटी से जकड़ा। तब उससे कहा, “हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” तब वह नींद से चौंक उठा, और खूँटी को धरन में से उखाड़कर उसे ताने समेत ले गया।
- Verse 15: तब दलीला ने उससे कहा, “तेरा मन तो मुझ से नहीं लगा, फिर तू क्यों कहता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ? तू ने तीनों बार मुझ से छल किया, और मुझे नहीं बताया कि तेरे बड़े बल का भेद क्या है।”
- Verse 16: इस प्रकार जब उसने हर दिन बातें करते करते उसको तंग किया, और यहाँ तक हठ किया कि उसकी नाक में दम आ गया,
- Verse 17: तब उसने अपने मन का सारा भेद खोलकर उससे कहा, “मेरे सिर पर छुरा कभी नहीं फिरा, क्योंकि मैं माँ के पेट ही से परमेश्वर का नाज़ीर हूँ, यदि मैं मूँड़ा जाऊँ, तो मेरा बल इतना घट जाएगा कि मैं साधारण मनुष्य के समान हो जाऊँगा।”
- Verse 18: यह देखकर कि उस ने अपने मन का सारा भेद मुझ से कह दिया है, दलीला ने पलिश्तियों के सरदारों के पास कहला भेजा, “अब की बार फिर आओ, क्योंकि उसने अपने मन का सब भेद मुझे बता दिया है।” तब पलिश्तियों के सरदार हाथ में रुपया लिए हुए उसके पास गए।
- Verse 19: तब उसने उसको अपने घुटनों पर सुला रखा; और एक मनुष्य बुलवाकर उसके सिर की सातों लटें मुण्डवा डालीं। और वह उसको दबाने लगी, और वह निर्बल हो गया।
- Verse 20: तब उसने कहा, “हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं!” तब वह चौंककर सोचने लगा, “मैं पहले के समान बाहर जाकर झटकूँगा।” वह तो न जानता था कि यहोवा उसके पास से चला गया है।
- Verse 21: तब पलिश्तियों ने उसको पकड़कर उसकी आँखें फोड़ डालीं, और उसे गाज़ा को ले जा के पीतल की बेड़ियों से जकड़ दिया; और वह बन्दीगृह में चक्की पीसने लगा।
- Verse 22: उसके सिर के बाल मुण्ड जाने के बाद फिर बढ़ने लगे।
- Verse 23: तब पलिश्तियों के सरदार अपने दागोन नामक देवता के लिये बड़ा बलिदान चढ़ाने और आनन्द करने को यह कहकर इकट्ठे हुए, “हमारे देवता ने हमारे शत्रु शिमशोन को हमारे हाथ में कर दिया है।”
- Verse 24: और जब लोगों ने उसे देखा, तब यह कहकर अपने देवता की बड़ाई की, “हमारे देवता ने हमारे शत्रु, और हमारे देश का नाश करनेवाले को, जिस ने हम में से बहुतों को मार भी डाला, हमारे हाथ में कर दिया है।”
- Verse 25: जब उनका मन मगन हो गया, तब उन्हों ने कहा, “शिमशोन को बुलवा लो कि वह हमारे लिये तमाशा करे।” इसलिये शिमशोन बन्दीगृह में से बुलवाया गया, और उनके लिये तमाशा करने लगा, और खम्भों के बीच खड़ा कर दिया गया।
- Verse 26: तब शिमशोन ने उस लड़के से जो उसका हाथ पकड़े था कहा, “मुझे उन खम्भों को, जिनसे घर सम्भला हुआ है, छूने दे कि मैं उस पर टेक लगाऊँ।”
- Verse 27: वह घर स्त्री पुरुषों से भरा हुआ था; और पलिश्तियों के सब सरदार भी वहाँ थे, और छत पर कोई तीन हज़ार स्त्री पुरुष थे, जो शिमशोन को तामाशा करते हुए देख रहे थे।
- Verse 28: तब शिमशोन ने यह कहकर यहोवा की दोहाई दी, “हे प्रभु यहोवा, मेरी सुधि ले; हे परमेश्वर, अब की बार मुझे बल दे, कि मैं पलिश्तियों से अपनी दोनों आँखों का एक ही पलटा लूँ।”
- Verse 29: तब शिमशोन ने उन दोनों बीचवाले खम्भों को, जिनसे घर सम्भला हुआ था, पकड़कर एक पर तो दाहिने हाथ से और दूसरे पर बाएँ हाथ से बल लगा दिया।
- Verse 30: और शिमशोन ने कहा, “पलिश्तियों के संग मेरा प्राण भी जाए।” और वह अपना सारा बल लगाकर झुका; तब वह घर सब सरदारों और उसमें के सारे लोगों पर गिर पड़ा। इस प्रकार जिनको उसने मरते समय मार डाला वे उनसे भी अधिक थे जिन्हें उसने अपने जीवन में मार डाला था।
- Verse 31: तब उसके भाई और उसके पिता के सारे घराने के लोग आए, और उसे उठाकर ले गए, और सोरा और एश्ताओल के मध्य उसके पिता मानोह की कबर में मिट्टी दी। उसने इस्राएल का न्याय बीस वर्ष तक किया था।