पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
भजन संहिता
अध्याय 107
1 : यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; और उसकी करुणा सदा की है!
2 : यहोवा के छुड़ाए हुए ऐसा ही कहें, जिन्हें उसने शत्रु के हाथ से दाम देकर छुड़ा लिया है,
3 : और उन्हें देश देश से, पूरब–पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से इकट्ठा किया है।
4 : वे जंगल में मरुभूमि के मार्ग पर भटकते फिरे, और कोई बसा हुआ नगर न पाया;
5 : भूख और प्यास के मारे, वे विकल हो गए।
6 : तब उन्होंने संकट में यहोवा की दोहाई दी, और उसने उनको सकेती से छुड़ाया;
7 : और उनको ठीक मार्ग पर चलाया, ताकि वे बसने के लिये किसी नगर को जा पहुँचे।
8 : लोग यहोवा की करुणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण, जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें!
9 : क्योंकि वह अभिलाषी जीव को सन्तुष्ट करता है, और भूखे को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है।
10 : जो अन्धियारे और मृत्यु की छाया में बैठे, और दु:ख में पड़े और बेड़ियों से जकड़े हुए थे,
11 : इसलिये कि वे परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध चले, और परमप्रधान की सम्मति को तुच्छ जाना।
12 : तब उसने उनको कष्ट के द्वारा दबाया; वे ठोकर खाकर गिर पड़े, और उनको कोई सहायक न मिला।
13 : तब उन्होंने संकट में यहोवा की दोहाई दी, और उसने सकेती से उनका उद्धार किया;
14 : उसने उनको अन्धियारे और मृत्यु की छाया में से निकाल लिया; और उनके बन्धनों को तोड़ डाला।
15 : लोग यहोवा की करुणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें।
16 : क्योंकि उसने पीतल के फाटकों को तोड़ा, और लोहे के बेण्डों को टुकड़े टुकड़े किया।
17 : मूढ़ अपनी कुचाल, और अधर्म के कामों के कारण अति दु:खित होते हैं।
18 : उनका जी सब भाँति के भोजन से मिचलाता है, और वे मृत्यु के फाटक तक पहुँचते हैं।
19 : तब वे संकट में यहोवा की दोहाई देते हैं, और वह सकेती से उनका उद्धार करता है;
20 : वह अपने वचन के द्वारा उनको चंगा करता और जिस गड़हे में वे पड़े हैं, उससे निकालता है।
21 : लोग यहोवा की करुणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें।
22 : और वे धन्यवादबलि चढ़ाएँ, और जयजयकार करते हुए, उसके कामों का वर्णन करें।
23 : जो लोग जहाज़ों में समुद्र पर चलते हैं, और महासागर पर होकर व्यापार करते हैं;
24 : वे यहोवा के कामों को, और उन आश्चर्यकर्मों को जो वह गहिरे समुद्र में करता है, देखते हैं।
25 : क्योंकि वह आज्ञा देता है, तब प्रचण्ड बयार उठकर तरंगों को उठाती है।
26 : वे आकाश तक चढ़ जाते, फिर गहराई में उतर आते हैं; और क्लेश के मारे उनके जी में जी नहीं रहता;
27 : वे चक्कर खाते, और मतवाले की भाँति लडखड़ाते हैं, और उनकी सारी बुद्धि मारी जाती है।
28 : तब वे संकट में यहोवा की दोहाई देते हैं, और वह उनको सकेती से निकालता है।
29 : वह आँधी को शान्त कर देता है और तरंगें बैठ जाती हैं।
30 : तब वे उनके बैठने से आनन्दित होते हैं, और वह उनको मन चाहे बन्दरगाह में पहुँचा देता है।
31 : लोग यहोवा की करुणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें।
32 : और सभा में उसको सराहें, और पुरनियों की बैठक में उसकी स्तुति करें।
33 : वह नदियों को जंगल बना डालता है, और जल के सोतों को सूखी भूमि कर देता है।
34 : वह फलवन्त भूमि को नोनी करता है, यह वहाँ के रहनेवालों की दुष्टता के कारण होता है।
35 : वह जंगल को जल का ताल, और निर्जल देश को जल के सोते कर देता है।
36 : और वहाँ वह भूखों को बसाता है, कि वे बसने के लिये नगर तैयार करें;
37 : और खेती करें, और दाख की बारियाँ लगाएँ, और भाँति भाँति के फल उपजा लें।
38 : वह उनको ऐसी आशीष देता है कि वे बहुत बढ़ जाते हैं, और उनके पशुओं को भी वह घटने नहीं देता।
39 : फिर अन्धेर, विपत्ति और शोक के कारण, वे घटते और दब जाते हैं;
40 : और वह हाकिमों को अपमान से लादकर मार्ग रहित जंगल में भटकाता है;
41 : वह दरिद्रों को दु:ख से छुड़ाकर ऊँचे पर रखता है, और उनको भेड़ों के झुण्ड सा परिवार देता है।
42 : सीधे लोग देखकर आनन्दित होते हैं; और सब कुटिल लोग अपने मुँह बन्द करते हैं।
43 : जो कोई बुद्धिमान हो, वह इन बातों पर ध्यान करेगा; और यहोवा की करुणा के कामों पर ध्यान करेगा।