ಕನ್ನಡ ಸತ್ಯವೇದವು
पुराना नियम
भजन संहिता
अध्याय 58
1 : हे मनुष्यो, क्या तुम सचमुच धर्म की बात बोलते हो? हे मनुष्यवंशियो, क्या तुम सीधाई से न्याय करते हो?
2 : नहीं, तुम मन ही मन में कुटिल काम करते हो; तुम देश भर में उपद्रव करते जाते हो।
3 : दुष्ट लोग जन्मते ही पराए हो जाते हैं, वे पेट से निकलते ही झूठ बोलते हुए भटक जाते हैं।
4 : उन में सर्प का सा विष है; वे उस नाग के समान हैं, जो सुनना नहीं चाहता;
5 : और सपेरा कितनी भी निपुणता से क्यों न मंत्र पढ़े, तौभी उसकी नहीं सुनता।
6 : हे परमेश्वर, उनके मुँह में से दाँतों को तोड़ दे; हे यहोवा, उन जवान सिंहों की दाढ़ों को उखाड़ डाल!
7 : वे घुलकर बहते हुए पानी के समान हो जाएँ; जब वे अपने तीर चढ़ाएँ, तब तीर मानो दो टुकड़े हो जाएँ।
8 : वे घोंघे के समान हो जाएँ जो घुलकर नष्ट हो जाता है, और स्त्री के गिरे हुए गर्भ के समान हो जिस ने सूरज को देखा ही नहीं।
9 : इस से पहले कि तुम्हारी हांडियों में काँटों की आँच लगे, हरे व जले, दोनों को वह बवण्डर से उड़ा ले जाएगा।
10 : धर्मी ऐसा पलटा देखकर आनन्दित होगा; वह अपने पाँव दुष्ट के लहू में धोएगा।
11 : तब मनुष्य कहने लगेंगे, निश्चय धर्मी के लिये फल है; निश्चय परमेश्वर है, जो पृथ्वी पर न्याय करता है।