पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
अय्यूब
अध्याय 39
1 : “क्या तू जानता है कि पहाड़ पर की जंगली बकरियाँ कब बच्चे देती हैं? या जब हरिणियाँ बियाती हैं, तब क्या तू देखता रहता है?
2 : क्या तू उनके महीने गिन सकता है? क्या तू उनके बियाने का समय जानता है?
3 : जब वे बैठकर अपने बच्चों को जनतीं, और अपनी पीड़ा से छूट जाती हैं?
4 : उनके बच्चे हृष्टपुष्ट होकर मैदान में बढ़ जाते हैं; वे निकल जाते और फिर नहीं लौटते।
5 : “किसने बनैले गदहे को स्वाधीन करके छोड़ दिया है? किसने उसके बंधन खोले हैं?
6 : उसका घर मैं ने निर्जल देश को, और उसका निवास लोनिया भूमि को ठहराया है।
7 : वह नगर के कोलाहल पर हँसता, और हाँकनेवाले की हाँक सुनता भी नहीं।
8 : पहाड़ों पर जो कुछ मिलता है उसे वह चरता, और सब भाँति की हरियाली ढूँढ़ता फिरता है।
9 : “क्या जंगली साँड़ तेरा काम प्रसन्नता से करेगा? क्या वह तेरी चरनी के पास रहेगा?
10 : क्या तू जंगली साँड़ को रस्से से बाँधकर रेघारियों में चला सकता है? क्या वह नालों में तेरे पीछे पीछे हेंगा फेरेगा?
11 : क्या तू उसके बड़े बल के कारण उस पर भरोसा करेगा? या जो परिश्रम का काम तेरा हो, क्या तू उसे उस पर छोड़ेगा?
12 : क्या तू उसका विश्वास करेगा कि वह तेरा अनाज घर ले आए, और तेरे खलिहान का अन्न इकट्ठा करे?
13 : “फिर शुतुरमुर्गी अपने पंखों को आनन्द से फुलाती है, परन्तु क्या ये पंख और पर स्नेह को प्रगट करते हैं?
14 : क्योंकि वह तो अपने अण्डे भूमि पर छोड़ देती और धूलि में उन्हें गर्म करती है;
15 : और इसकी सुधि नहीं रखती कि वे पाँव से कुचले जाएँगे, या कोई वनपशु उनको कुचल डालेगा।
16 : वह अपने बच्चों से ऐसी कठोरता करती है कि मानो उसके नहीं हैं; यद्यपि उसका कष्ट अकारथ होता है, तौभी वह निश्चिन्त रहती है;
17 : क्योंकि परमेश्वर ने उसको बुद्धिरहित बनाया, और उसे समझने की शक्ति नहीं दी।
18 : जिस समय वह भागने के लिये अपने पंख फैलाती है, तब घोड़े और उसके सवार दोनों को कुछ नहीं समझती है।
19 : “क्या तू ने घोड़े को उसका बल दिया है? क्या तू ने उसकी गर्दन में फहराती हुई अयाल जमाई है?
20 : क्या उसको टिड्डी के समान उछलने की शक्ति तू देता है? उसके फुँक्कारने का शब्द डरावना होता है।
21 : वह तराई में टाप मारता है और अपने बल से हर्षित रहता है, वह हथियारबन्दों का सामना करने को निकल पड़ता है।
22 : वह डर की बात पर हँसता, और नहीं घबराता; और तलवार से पीछे नहीं हटता।
23 : तर्कश और चमकता हुआ सांग और भाला उस पर खड़खड़ाता है।
24 : वह रिस और क्रोध के मारे भूमि को निगलता है; जब नरसिंगे का शब्द सुनाई देता है तब वह रुकता नहीं।
25 : जब जब नरसिंगा बजता तब तब वह हिन हिन करता है, और लड़ाई और अफसरों की ललकार और जय–जयकार को दूर से सूँघ लेता है।
26 : “क्या तेरे समझाने से बाज उड़ता है, और दक्षिण की ओर उड़ने को अपने पंख फैलाता है?
27 : क्या उकाब तेरी आज्ञा से ऊपर चढ़ जाता है, और ऊँचे स्थान पर अपना घोंसला बनाता है?
28 : वह चट्टान पर रहता और चट्टान की चोटी और दृढ़स्थान पर बसेरा करता है।
29 : वह अपनी आँखों से दूर तक देखता है, वहाँ से वह अपने अहेर को ताक लेता है।
30 : उसके बच्चे भी लहू चूसते हैं; और जहाँ घात किए हुए लोग होते वहाँ वह भी होता है।”