ಕನ್ನಡ ಸತ್ಯವೇದವು
पुराना नियम
विलापगीत
अध्याय 3
1 : उसके रोष की छड़ी से दु:ख भोगनेवाला पुरुष मैं ही हूँ;
2 : वह मुझे ले जाकर उजियाले में नहीं, अन्धियारे ही में चलाता है;
3 : उसका हाथ दिन भर मेरे ही विरुद्ध उठता रहता है।
4 : उस ने मेरा मांस और चमड़ा गला दिया है, और मेरी हड्डियों को तोड़ दिया है;
5 : उस ने मुझे रोकने के लिए किला बनाया, और मुझ को कठिन दु:ख और श्रम से घेरा है;
6 : उस ने मुझे बहुत दिन के मरे हुए लोगों के समान अन्धेरे स्थानों में बसा दिया है।
7 : मेरे चारों ओर उस ने बाड़ा बाँधा है कि मैं निकल नहीं सकता; उस ने मुझे भारी साँकल से जकड़ा है;
8 : मैं चिल्ला चिल्ला के दोहाई देता हूँ, तौभी वह मेरी प्रार्थना नहीं सुनता;
9 : मेरे मार्गों को उस ने गढ़े हुए पत्थरों से रोक रखा है, मेरी डगरों को उस ने टेढ़ी कर दिया है।
10 : वह मेरे लिये घात में बैठे हुए रीछ और घात लगाए हुए सिंह के समान है;
11 : उस ने मुझे मेरे मार्गों से भुला दिया, और मुझे फाड़ डाला; उस ने मुझ को उजाड़ दिया है।
12 : उस ने धनुष चढ़ाकर मुझे अपने तीर का निशाना बनाया है।
13 : उस ने अपने तीरों से मेरे हृदय को बेध दिया है;
14 : सब लोग मुझ पर हँसते हैं और दिन भर मुझ पर ढालकर गीत गाते हैं,
15 : उस ने मुझे कठिन दु:ख से भर दिया, और नागदौना पिलाकर तृप्त किया है।
16 : उस ने मेरे दाँतों को कंकरी से तोड़ डाला, और मुझे राख से ढाँप दिया है;
17 : और मुझ को मन से उतारकर कुशल से रहित किया है; मैं कल्याण भूल गया हूँ;
18 : इसलिये मैं ने कहा, “मेरा बल नष्ट हुआ, और मेरी आशा जो यहोवा पर थी, वह टूट गई है।”
19 : मेरा दु:ख और मारा मारा फिरना, मेरा नागदौने और–और विष का पीना स्मरण कर!
20 : मैं उन्हीं पर सोचता रहता हूँ, इस से मेरा प्राण ढला जाता है।
21 : परन्तु मैं यह स्मरण करता हूँ, इसी लिये मुझे आशा है :
22 : हम मिट नहीं गए; यह यहोवा की महाकरुणा का फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है।
23 : प्रति भोर वह नई होती रहती है; तेरी सच्चाई महान् है।
24 : मेरे मन ने कहा, “यहोवा मेरा भाग है, इस कारण मैं उस में आशा रखूँगा।”
25 : जो यहोवा की बाट जोहते और उसके पास जाते हैं, उनके लिये यहोवा भला है।
26 : यहोवा से उद्धार पाने की आशा रखकर चुपचाप रहना भला है।
27 : पुरुष के लिये जवानी में जूआ उठाना भला है।
28 : वह यह जानकर अकेला चुपचाप रहे, कि परमेश्वर ही ने उस पर यह बोझ डाला है;
29 : वह अपना मुँह धूल में रखे, क्या जाने इसमें कुछ आशा हो।
30 : वह अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे।
31 : क्योंकि प्रभु मन से सर्वदा उतारे नहीं रहता,
32 : चाहे वह दु:ख भी दे, तौभी अपनी करुणा की बहुतायत के कारण वह दया भी करता है;
33 : क्योंकि वह मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न दु:ख देता है।
34 : पृथ्वी भर के बन्दियों को पाँव के तले दलित करना,
35 : किसी पुरुष का हक़ परमप्रधान के सामने मारना,
36 : और किसी मनुष्य का मुक़द्दमा बिगाड़ना, इन तीन कामों को यहोवा देख नहीं सकता।
37 : यदि यहोवा ने आज्ञा न दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए?
38 : विपत्ति और कल्याण, क्या दोनों परमप्रधान की आज्ञा से नहीं होते।
39 : इसलिये जीवित मनुष्य क्यों कुड़कुड़ाए? और पुरुष अपने पाप के दण्ड को क्यों बुरा माने?
40 : हम अपने चालचलन को ध्यान से परखें, और यहोवा की ओर फिरें!
41 : हम स्वर्गवासी परमेश्वर की ओर मन लगाएँ और हाथ फैलाएँ और कहें :
42 : “हम ने तो अपराध और बलवा किया है, और तू ने क्षमा नहीं किया।
43 : तेरा कोप हम पर है, तू हमारे पीछे पड़ा है, तू ने बिना तरस खाए घात किया है।
44 : तू ने अपने को मेघ से घेर लिया है कि तुझ तक प्रार्थना न पहुँच सके।
45 : तू ने हम को जाति जाति के लोगों के बीच में कूड़ा–कर्कट सा ठहराया है।
46 : हमारे सब शत्रुओं ने हम पर अपना अपना मुँह फैलाया है;
47 : भय और गड़हा, उजाड़ और विनाश, हम पर आ पड़े हैं;
48 : मेरी आँखों से मेरी प्रजा की पुत्री के विनाश के कारण जल की धाराएँ बह रही हैं।
49 : मेरी आँख से लगातार आँसू बहते रहेंगे,
50 : जब तक यहोवा स्वर्ग से मेरी ओर न देखे;
51 : अपनी नगरी की सब स्त्रियों का हाल देखने पर मेरा दु:ख बढ़ता है।
52 : जो व्यर्थ मेरे शत्रु बने हैं, उन्होंने निर्दयता से चिड़िया के समान मेरा आहेर किया है;
53 : उन्होंने मुझे गड़हे में डालकर मेरे जीवन का अन्त करने के लिये मेरे ऊपर पत्थर लुढ़काए हैं;
54 : मेरे सिर पर से जल बह गया, मैं ने कहा, ‘मैं अब नाश हो गया।’
55 : हे यहोवा, गहिरे गड़हे में से मैं ने तुझ से प्रार्थना की;
56 : तू ने मेरी सुनी कि जो दोहाई देकर मैं चिल्लाता हूँ उस से कान न फेर ले!
57 : जब मैं ने तुझे पुकारा, तब तू ने मुझ से कहा, ‘मत डर!’
58 : हे यहोवा, तू ने मेरा मुक़द्दमा लड़कर मेरा प्राण बचा लिया है।
59 : हे यहोवा, जो अन्याय मुझ पर हुआ है उसे तू ने देखा है; तू मेरा न्याय चुका।
60 : जो बदला उन्होंने मुझ से लिया, और जो कल्पनाएँ मेरे विरुद्ध कीं, उन्हें भी तू ने देखा है।
61 : हे यहोवा, जो कल्पनाएँ और निन्दा वे मेरे विरुद्ध करते हैं, वे भी तू ने सुनी हैं।
62 : मेरे विरोधियों के वचन, और जो कुछ भी वे मेरे विरुद्ध लगातार सोचते हैं, उन्हें तू जानता है।
63 : उनका उठना–बैठना ध्यान से देख; वे मुझ पर लगते हुए गीत गाते हैं।
64 : हे यहोवा, तू उनके कामों के अनुसार उनको बदला देगा।
65 : तू उनका मन सुन्न कर देगा; तेरा शाप उन पर होगा।
66 : हे यहोवा, तू अपने कोप से उनको खदेड़–खदेड़कर धरती पर से नष्ट कर देगा।”