पवित्र बाइबिल
पुराना नियम
उत्पत्ति
अध्याय 32
- Verse 1: याक़ूब ने भी अपना मार्ग लिया और परमेश्वर के दूत उसे आ मिले।
- Verse 2: उनको देखते ही याक़ूब ने कहा, “यह तो परमेश्वर का दल है।” इसलिये उस ने उस स्थान का नाम महनैम रखा।
- Verse 3: तब याक़ूब ने सेईर देश में, अर्थात् एदोम देश में, अपने भाई एसाव के पास अपने आगे दूत भेज दिए,
- Verse 4: और उसने उन्हें यह आज्ञा दी, “मेरे प्रभु एसाव से यों कहना : तेरा दास याक़ूब तुझ से यों कहता है कि मैं लाबान के यहाँ परदेशी होकर अब तक रहा;
- Verse 5: और मेरे पास गाय–बैल, गदहे, भेड़–बकरियाँ, और दास–दासियाँ हैं : और मैं ने अपने प्रभु के पास इसलिये संदेश भेजा है कि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो।”
- Verse 6: वे दूत याक़ूब के पास लौट के कहने लगे, “हम तेरे भाई एसाव के पास गए थे, और वह भी तुझ से भेंट करने को चार सौ पुरुष संग लिये हुए चला आता है।”
- Verse 7: तब याक़ूब बहुत डर गया, और संकट में पड़ा; और यह सोचकर अपने साथियों के, और भेड़–बकरियों के, और गाय–बैलों, और ऊँटों के भी अलग–अलग दो दल कर लिये,
- Verse 8: कि यदि एसाव आकर पहले दल को मारने लगे, तो दूसरा दल भागकर बच जाएगा।
- Verse 9: फिर याक़ूब ने कहा, “हे यहोवा, हे मेरे दादा अब्राहम के परमेश्वर, हे मेरे पिता इसहाक के परमेश्वर, तू ने तो मुझ से कहा था कि अपने देश और जन्मभूमि में लौट जा, और मैं तेरी भलाई करूँगा :
- Verse 10: तू ने जो जो काम अपनी करुणा और सच्चाई से अपने दास के साथ किए हैं, कि मैं जो अपनी छड़ी ही लेकर इस यरदन नदी के पार उतर आया, और अब मेरे दो दल हो गए हैं; तेरे ऐसे ऐसे कामों में से मैं एक के भी योग्य तो नहीं हूँ।
- Verse 11: मेरी विनती सुनकर मुझे मेरे भाई एसाव के हाथ से बचा : मैं तो उससे डरता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि वह आकर मुझे और माँ समेत लड़कों को भी मार डाले।
- Verse 12: तू ने तो कहा है कि मैं निश्चय तेरी भलाई करूँगा, और तेरे वंश को समुद्र की बालू के किनकों के समान बहुत करूँगा, जो बहुतायत के मारे गिने नहीं जा सकते।”
- Verse 13: उसने उस दिन रात वहीं बिताई; और जो कुछ उसके पास था उसमें से अपने भाई एसाव की भेंट के लिये छाँट छाँटकर निकाला;
- Verse 14: अर्थात् दो सौ बकरियाँ, और बीस बकरे, और दो सौ भेड़ें, और बीस मेढ़े,
- Verse 15: और बच्चों समेत दूध देनेवाली तीस ऊँटनियाँ, और चालीस गायें, और दस बैल, और बीस गदहियाँ और उनके दस बच्चे।
- Verse 16: इनको उसने झुण्ड–झुण्ड करके, अपने दासों को सौंपकर उनसे कहा, “मेरे आगे बढ़ जाओ; और झुण्डों के बीच बीच में अन्तर रखो।”
- Verse 17: फिर उसने अगले झुण्ड के रखवाले को यह आज्ञा दी, “जब मेरा भाई एसाव तुझे मिले, और पूछने लगे, ‘तू किसका दास है, और कहाँ जाता है, और ये जो तेरे आगे आगे हैं, वे किसके हैं?’
- Verse 18: तब कहना, ‘यह तेरे दास याक़ूब के हैं। हे मेरे प्रभु एसाव, ये भेंट के लिये तेरे पास भेजे गए हैं, और वह आप भी हमारे पीछे–पीछे आ रहा है’।”
- Verse 19: और उसने दूसरे और तीसरे रखवालों को भी, वरन् उन सभों को जो झुण्डों के पीछे–पीछे थे ऐसी ही आज्ञा दी कि जब एसाव तुम को मिले तब इसी प्रकार उससे कहना।
- Verse 20: और यह भी कहना, “तेरा दास याक़ूब हमारे पीछे–पीछे आ रहा है।” क्योंकि उसने यह सोचा कि यह भेंट जो मेरे आगे आगे जाती है, इसके द्वारा मैं उसके क्रोध को शान्त करके तब उसका दर्शन करूँगा; हो सकता है वह मुझ से प्रसन्न हो जाए।
- Verse 21: इसलिये वह भेंट याक़ूब से पहले पार उतर गई, और वह आप उस रात को छावनी में रहा।
- Verse 22: उसी रात वह उठा और अपनी दोनों स्त्रियों, और दोनों दासियों और ग्यारहों लड़कों को संग लेकर घाट से यब्बोक नदी के पार उतर गया।
- Verse 23: उसने उन्हें उस नदी के पार उतार दिया, वरन् अपना सब कुछ पार उतार दिया।
- Verse 24: और याक़ूब आप अकेला रह गया; तब कोई पुरुष आकर पौ फटने तक उससे मल्लयुद्ध करता रहा।
- Verse 25: जब उसने देखा कि मैं याक़ूब पर प्रबल नहीं होता, तब उसकी जाँघ की नस को छुआ; और याक़ूब की जाँघ की नस उससे मल्लयुद्ध करते ही करते चढ़ गई।
- Verse 26: तब उसने कहा, “मुझे जाने दे, क्योंकि भोर होने वाला है,” याक़ूब ने कहा, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा।”
- Verse 27: और उसने याक़ूब से पूछा, “तेरा नाम क्या है?” उसने कहा, “याक़ूब।”
- Verse 28: उसने कहा, “तेरा नाम अब याक़ूब नहीं, परन्तु इस्राएल होगा, क्योंकि तू परमेश्वर से और मनुष्यों से भी युद्ध करके प्रबल हुआ है।”
- Verse 29: याक़ूब ने कहा, “मैं विनती करता हूँ, मुझे अपना नाम बता।” उसने कहा, “तू मेरा नाम क्यों पूछता है?” तब उसने उसको वहीं आशीर्वाद दिया।
- Verse 30: तब याक़ूब ने यह कहकर उस स्थान का नाम पनीएल रखा; “परमेश्वर को आमने–सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।”
- Verse 31: पनीएल के पास से चलते–चलते सूर्य उदय हो गया, और वह जाँघ से लंगड़ाता था।
- Verse 32: इस्राएली जो पशुओं की जाँघ को जोड़वाले जंघानस को आज के दिन तक नहीं खाते, इसका कारण यही है कि उस पुरुष ने याक़ूब की जाँघ के जोड़ में जंघानस को छुआ था।