P. O. C ബൈബിള്
पुराना नियम
भजन संहिता
अध्याय 105
1 : यहोवा का धन्यवाद करो, उस से प्रार्थना करो, देश देश के लोगों में उसके कामों का प्रचार करो!
2 : उसके लिये गीत गाओ, उसके लिये भजन गाओ, उसके सब आश्चर्यकर्मों पर ध्यान करो!
3 : उसके पवित्र नाम की बड़ाई करो; यहोवा के खोजियों का हृदय आनन्दित हो!
4 : यहोवा और उसकी सामर्थ्य को खोजो, उसके दर्शन के लगातार खोजी बने रहो!
5 : उसके किए हुए आश्चर्यकर्म स्मरण करो, उसके चमत्कार और निर्णय स्मरण करो!
6 : हे उसके दास अब्राहम के वंश, हे याकूब की सन्तान, तुम तो उसके चुने हुए हो!
7 : वही हमारा परमेश्वर यहोवा है; पृथ्वी भर में उसके निर्णय होते हैं।
8 : वह अपनी वाचा को सदा स्मरण रखता आया है, यह वही वचन है जो उसने हज़ार पीढ़ियों के लिये ठहराया है;
9 : वही वाचा जो उसने अब्राहम के साथ बाँधी, और उसके विषय में उसने इसहाक से शपथ खाई,
10 : और उसी को उसने याकूब के लिये विधि करके, और इस्राएल के लिये यह कहकर सदा की वाचा करके दृढ़ किया,
11 : “मैं कनान देश को तुझी को दूँगा, वह बाँट में तुम्हारा निज भाग होगा।”
12 : उस समय तो वे गिनती में थोड़े थे, वरन् बहुत ही थोड़े, और उस देश में परदेशी थे।
13 : वे एक जाति से दूसरी जाति में, और एक राज्य से दूसरे राज्य में फिरते रहे;
14 : परन्तु उसने किसी मनुष्य को उन पर अन्धेर करने न दिया; और वह राजाओं को उनके निमित्त यह धमकी देता था,
15 : “मेरे अभिषिक्तों को मत छूओ, और न मेरे नबियों की हानि करो!”
16 : फिर उसने उस देश में अकाल भेजा, और अन्न के सब आधार को दूर कर दिया।
17 : उसने यूसुफ नामक एक पुरुष को उनसे पहले भेजा था, जो दास होने के लिये बेचा गया था।
18 : लोगों ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डालकर उसे दु:ख दिया; वह लोहे की साँकलों से जकड़ा गया;
19 : जब तक कि उसकी बात पूरी न हुई तब तक यहोवा का वचन उसे कसौटी पर कसता रहा।
20 : तब राजा ने दूत भेजकर उसे निकलवा लिया, और देश देश के लोगों के स्वामी ने उसके बन्धन खुलवाए;
21 : उसने उसको अपने भवन का प्रधान और अपनी पूरी सम्पत्ति का अधिकारी ठहराया,
22 : कि वह उसके हाकिमों को अपनी इच्छा के अनुसार कैद करे और पुरनियों को ज्ञान सिखाए।
23 : फिर इस्राएल मिस्र में आया; और याकूब हाम के देश में परदेशी रहा।
24 : तब उसने अपनी प्रजा को गिनती में बहुत बढ़ाया, और उसके शत्रुओं से अधिक बलवन्त किया।
25 : उसने मिस्रियों के मन को ऐसा फेर दिया, कि वे उसकी प्रजा से बैर रखने, और उसके दासों से छल करने लगे।
26 : उसने अपने दास मूसा को, और अपने चुने हुए हारून को भेजा।
27 : उन्होंने उनके बीच उसकी ओर से भाँति भाँति के चिह्न, और हाम के देश में चमत्कार दिखाए।
28 : उसने अन्धकार कर दिया, और अन्धियारा हो गया; और उन्होंने उसकी बातों को न टाला।
29 : उसने मिस्रियों के जल को लहू कर डाला, और मछलियों को मार डाला।
30 : मेंढक उनकी भूमि में वरन् उनके राजा की कोठरियों में भी भर गए।
31 : उसने आज्ञा दी, तब डाँस आ गए, और उनके सारे देश में कुटकियाँ आ गईं।
32 : उसने उनके लिये जलवृष्टि के बदले ओले, और उनके देश में धधकती आग बरसाई।
33 : उसने उनकी दाखलताओं और अंजीर के वृक्षों को वरन् उनके देश के सब पेड़ों को तोड़ डाला।
34 : उसने आज्ञा दी तब अनगिनत टिड्डियाँ, और कीड़े आए,
35 : और उन्होंने उनके देश के सब अन्न आदि को खा डाला; और उनकी भूमि के सब फलों को चट कर गए।
36 : उसने उनके देश के सब पहिलौठों को, उनके पौरुष के सब पहले फल को नष्ट किया।
37 : तब वह इस्राएल को सोना चाँदी दिलाकर निकाल लाया, और उनमें से कोई निर्बल न था।
38 : उनके जाने से मिस्री आनन्दित हुए, क्योंकि उनका डर उनमें समा गया था।
39 : उसने छाया के लिये बादल फैलाया, और रात को प्रकाश देने के लिये आग प्रगट की।
40 : उन्होंने माँगा तब उसने बटेरें पहुँचाई, और उनको स्वर्गीय भोजन से तृप्त किया।
41 : उसने चट्टान फाड़ी तब पानी बह निकला; और निर्जल भूमि पर नदी बहने लगी।
42 : क्योंकि उसने अपने पवित्र वचन और अपने दास अब्राहम को स्मरण किया।
43 : वह अपनी प्रजा को हर्षित करके और अपने चुने हुओं से जयजयकार कराके निकाल लाया।
44 : और उनको जाति जाति के देश दिए; और वे अन्य लोगों के श्रम के फल के अधिकारी किए गए।
45 : कि वे उसकी विधियों को मानें, और उसकी व्यवस्था को पूरी करें। याह की स्तुति करो!