வேதாகமம்
पुराना नियम
नीतिवचन
अध्याय 20
- Verse 1: दाखमधु ठट्ठा करनेवाला और मदिरा हल्ला मचानेवाली है; जो कोई उसके कारण चूक करता है, वह बुद्धिमान नहीं।
- Verse 2: राजा का भय दिखाना, सिंह का गरजना है; जो उस पर रोष करता, वह अपने प्राण का अपराधी होता है।
- Verse 3: मुक़द्दमे से हाथ उठाना, पुरुष की महिमा ठहरती है; परन्तु सब मूढ़ झगड़ने को तैयार होते हैं।
- Verse 4: आलसी मनुष्य शीत के कारण हल नहीं जोतता; इसलिये कटनी के समय वह भीख माँगता, और कुछ नहीं पाता।
- Verse 5: मनुष्य के मन की युक्ति अथाह तो है, तौभी समझवाला मनुष्य उसको निकाल लेता है।
- Verse 6: बहुत से मनुष्य अपनी कृपा का प्रचार करते हैं; परन्तु सच्चा पुरुष कौन पा सकता है?
- Verse 7: धर्मी जो खराई से चलता रहता है, उसके पीछे उसके बाल–बच्चे धन्य होते हैं।
- Verse 8: राजा जो न्याय के सिंहासन पर बैठा करता है, वह अपनी दृष्टि ही से सब बुराई को छाँट लेता है।
- Verse 9: कौन कह सकता है कि मैं ने अपने हृदय को पवित्र किया; अथवा मैं पाप से शुद्ध हुआ हूँ?
- Verse 10: घटते–बढ़ते बटखरे और घटते–बढ़ते नपुए इन दोनों से यहोवा घृणा करता है।
- Verse 11: लड़का भी अपने कामों से पहिचाना जाता है, कि उसका काम पवित्र और सीधा है या नहीं।
- Verse 12: सुनने के लिये कान और देखने के लिये जो आँखें हैं, उन दोनों को यहोवा ने बनाया है।
- Verse 13: नींद से प्रीति न रख, नहीं तो दरिद्र हो जाएगा; आँखें खोल तब तू रोटी से तृप्त होगा।
- Verse 14: मोल लेने के समय ग्राहक, “अच्छी नहीं, अच्छी नहीं” कहता है; परन्तु चले जाने पर बड़ाई करता है।
- Verse 15: सोना और बहुत से मूँगे तो हैं; परन्तु ज्ञान की बातें अनमोल मणि ठहरी हैं।
- Verse 16: जो अनजाने का उत्तरदायी हुआ उसका कपड़ा, और जो पराए का उत्तरदायी हुआ उससे बंधक की वस्तु ले रख।
- Verse 17: चोरी–छिपे की रोटी मनुष्य को मीठी तो लगती है, परन्तु बाद में उसका मुँह कंकड़ों से भर जाता है।
- Verse 18: सब कल्पनाएँ सम्मति ही से स्थिर होती हैं; और युक्ति के साथ युद्ध करना चाहिये।
- Verse 19: जो लुतराई करता फिरता है वह भेद प्रगट करता है; इसलिये बकवादी से मेल जोल न रखना।
- Verse 20: जो अपने माता–पिता को कोसता, उसका दिया बुझ जाता, और घोर अन्धकार हो जाता है।
- Verse 21: जो भाग पहले उतावली से मिलता है, अन्त में उस पर आशीष नहीं होती।
- Verse 22: मत कह, “मैं बुराई का बदला लूँगा;” वरन् यहोवा की बाट जोहता रह, वह तुझ को छुड़ाएगा।
- Verse 23: घटते–बढ़ते बटखरों से यहोवा घृणा करता है, और छल का तराजू अच्छा नहीं।
- Verse 24: मनुष्य का मार्ग यहोवा की ओर से ठहराया जाता है; आदमी कैसे अपना चलना समझ सके?
- Verse 25: जो मनुष्य बिना विचारे किसी वस्तु को पवित्र ठहराए, और जो मन्नत मानकर पूछपाछ करने लगे, वह फन्दे में फँसेगा।
- Verse 26: बुद्धिमान राजा दुष्टों को फटकता है, और उन पर दाँवने का पहिया चलवाता है।
- Verse 27: मनुष्य की आत्मा यहोवा का दीपक है; वह मन की सब बातों की खोज करता है।
- Verse 28: राजा की रक्षा कृपा और सच्चाई के कारण होती है, और कृपा करने से उसकी गद्दी संभलती है।
- Verse 29: जवानों का गौरव उनका बल है, परन्तु बूढ़ों की शोभा उनके पक्के बाल हैं।
- Verse 30: चोट लगने से जो घाव होते हैं, वह बुराई दूर करते हैं; और मार खाने से हृदय निर्मल हो जाता है।